दरवाजे की ओट सें थकी अंखियां रही पथ निहार,
कब लौटेगा मेरा साहिबा, मेरे हिवड़े का हार?
सीमा पर तैनात मेरा जांबाज रणबांकुरा भरतार,
पहाड़ी पार छुपे आतंकियों पर कब करेगा प्रहार?
नयनों कें झील का सूखा-सूखा खारा- खारा पानी,
माँ के कलेजा का टुकड़ा, सीमा पर न करें आना-कानी!
मायर भूमि की सुन पुकार, छोडी मायर-बाप की ढाणी,
बूढ़े माँ-बाप को भूल लाडला देने चला मातृभूमि पर कुर्बानी!
झुर्रियों के मायाजाल में बुढ़ा बाप कभी नहीं उलझा,
मोहजाल की पहेली बाप-बेटा गये झटके में सुलझा!
फटी धोती, फटा कलेजा पर हौसला हिमालय सें बड़ा,
मायर भू की बलिवेदी पर छोटा बेटा था तैयार खड़ा!
सुनी हथेलियाँ, खामोश चुड़ला-चूड़ी-कंगन,
बिन-ब्याही बहना का नि:शब्द अरमानों का आँगन!
थकी-हारी निहारे भैया की कांटों भरी राह!
नयनन नीर, होठों पर शिकवे-शिकायतों भरी आह!
स्वरचित मौलिक रचना
कुसुम अशोक सुराणा,
मुंबई, महाराष्ट्र