लघुकथा
उद्योगपति पिता का इकलौता पुत्र, नाम उसका कौशल, कौशल अपने नाम अनुरूप शालीन व होनहार तो था, पर वो इतना सतर्क सजग व चालाक नहीं था, कौशल को माल सामग्री का ज्ञान व अन्य व्यापारिक गुर तो बहुत थे, पर एक बात की कमी कह सकते हैं कि 'कौशल' हर किसी पर विश्वास जल्दी कर लेता था, वो लोगों की बातों में जल्दी आ जाता थ
कौशद्वारा अशोक दोशील ने हस्त ऋण बिनाऔपचारिकता के कितनों को दे रखा था।
यह कह सकते हैं कि कौशल थोड़ा दयालु प्रवृत्ति का आदमी था, और लोग उसका गलत फायदा उठाने लगे। कौशल की पत्नी निर्मला को भी उससे एक मांगे तो हजार मिल जाता था।
कौशल के भोलेपन से बाप दादों के खजाने का तला दिखने लगा,
एक दिन कौशल से उसकी पत्नी निर्मला ने शोपिंग के लिए पैसे मांगे तो,
कौशल ने मना किया कि अभी हाथ में पैसे नहीं हैं, तब निर्मला के दिमाग की बत्ती जली, निर्मला ने कौशल के उद्योग व्यापार में हस्तक्षेप किया और कौशल को समझाया कि दयालु बनना अच्छी बात है, पर इतने भी मत बनों कि स्वयं की आर्थिक हालत पतली होने लगे। इतनी बड़ी बड़ी रकम जिसकी औकात नहीं उसे दे रखी है आपने, आपको समझ रखनी चाहिए थी ,और गलती मेरी है कि मुझे भी ध्यान देना था खैर! निर्मला ने व्यापार का आर्थिक मोर्चा अपने हाथ में ही ले लिया।
निर्मला ने एक 'जिंदगी का सबक' लिया,पत्नी भले गृहणी होने दो, उसे, अधिक नहीं तो न सही पर, थोड़ा बहुत तो पति के, चाल चलन व काम कारोबार में ध्यान जरूर देना चाहिए। कौशल ने भी अपने सगे स्वजनों,मित्रों के बुरे अनुभवों से जिंदगी का सबक लिया। और अब ठान लिया कि जीवन में जागरूकता जरूरी है ।
स्वरचित:अशोक दोशी