कैसी है कश्ती और कैसे है किनारे
न हम है तुम्हारे, न तुम हो हमारे,
चाहत जो की थी वो गुमशुम है कब से
लगता है मोहब्बत की ही न हो तुमसे..
देखे जो सपने, संजोके जो अपने
हकीकत में वो तो थे ही न अपने,
जो समय ने दिया है एकांत का विस्तार
तो महसूस हुआ वह था ही नही प्यार...
फिर भी यादों में रहते हो तुम
अब तक तुमको न भूले है हम,
कैसी है उलझन और कैसा है सफर
न हम हमसफर, न तुम हमसफर...
शायद अधूरा रहे मिलना भी हमसे
लेकिन चाहत कभी भी, न कम होगी तुमसे,
चलता रहेगा अंतर्दष्टि का सार
आती रहेगी फिर नयी पुकार....
कपिल तिवारी