गुरु पूर्णिमा पर 'भाव कुसुम' अर्पित है!
मैं फुरसत के पलो में कबीरदास जी का दोहा पढ़ रही थी..
"गुरु गोविन्द दोनों खड़े, काके लागु पाय
बलिहारी गुरु आपने, गोविन्द दियो बताय"
मैं आत्मनिरीक्षण क़र रही थी ...भाग्यवान थे हम जो हमें ऐसे गुरु मिलें जिन्होंने हमें किसी मूर्तिकार की तरह छीनी से ठोंक ठोंक कर एक बेहतरीन शिल्प..इन्सान .. बनाया। स्वाभिमान से जीने की कला सिखाई। वक्त के थपेड़े को सहने की ताकत पैदा की। श्रम का महत्व समझाया और हमारी जीने की राह आसान बना दी।
मैं भूतकाल में गोते लगा रही थी।
तभी टी वी चैनल पर ब्रेकिंग न्यूज़ आई ....नौवी कक्षा के बच्चे ने स्कूल में शिक्षक की हत्या कर दी...
मैं सुन्न हो गई। दिल बरबस कह उठा, "आज न वैसे शिष्य हैं न वैसे गुरु!"
वक्त के साथ-साथ शिक्षा के मायने बदल गएं हैं। गुरुकुल की परंपरा पुरानी हो चली है। प्रान्तीय भाषा में शिक्षा की जगह अंग्रेजी ने हथिया ली है। बस्तों का बोझ, होम-वर्क का टेंशन, प्रोजेक्ट वर्क, ढेर सारी किताबें..खाना गले में जैसे-तैसे ठूंस दिया और चल पड़े क्लासेस की ओर...घर में टीवी, वीडियो गेम, मोबाइल!
बच्चों के दायरे सिकुड़ गए हैं ...न दोस्तों से गपशप, न सहपाठियों के साथ कोई मैदानी खेल, न किसी से मिलाना न किसी बुजुर्ग से पल-दो-पल बातें करना...!! बस.. पढाई..पढाई..पढाई..वह भी सिर्फ किताबी किड़ों की तरह।
इम्तिहान ही बच्चे की क्षमता, प्रतिभा आंकने का साधन बन गया है। इम्तिहान के वक्त आत्महत्या, अवसाद, परीक्षा 'फोबिया' के शिकार हो रहे बच्चे इस घुटन भरे माहौल से छुटकारा पाना चाहते हैं। ऐसे में अगर कोई बच्चा शिक्षा से तौबा कर ले, या डांटने वाली अपनी शिक्षिका से इतनी नफरत करने लगे कि वह उसकी जान तक लेने पर अमादा हो जाये तो आश्चर्य नहीं होगा!
आखिर हम क्यों बचपन छिनने पर उतारुं हैं? जो उम्र नीले आसमान में स्वछंद उडान भरने की होती है... कल-कल बहते झरनों से बाते करनें की होती है..पहाड़ो की चोटियाँ गर्दन ऊँची क़र नापने की होती है उस उम्र में उनपर इतना जुल्म क्यों?
पैसे के पीछे भागते माता-पिता, एकल परिवार में पलता अकेला बच्चा, प्यार के आँचल की नमी को तरसता बच्चा, जब घंटो टीवी, वीडियो गेम, मोबाइल गेम खेलते रहेगा..न खाने की सुध, न पढ़ने की चाहत..ऐसे माहौल ये नन्हे पौधे सूखेंगे नहीं? कैसे उनपर रंगीन फूल खिलेंगे जो उनके और आपके सपनों में रंग भर सकें?...
शिक्षक सौ-सौ बच्चो को एक साथ पढ़ायेंगे तो क्या ध्यान रख पायेंगे बच्चे के बौद्धिक और सर्वांगींण विकास का? देश का भविष्य बनाने वाले ही जब अपनी बकाया पगार के लिए हड़ताल करने के लिए मजबूर होंगे, या फिर ट्यूशन में ध्यान देंगे तो वे क्या बच्चे से जुड़ पाएंगे? क्या वे बच्चे से रिश्ता बना पाएंगे? अभिभावक न तो उन शिक्षकों को गुरु का सम्मानजनक दर्जा देते हैं न अपने बच्चे को गुरु का सम्मान करना सिखाते हैं तो फिर इन भटके हुए बच्चों को किसका सहारा?..वो बिना पतवार की कश्ती की तरह भटकेंगे ही न!
वाल्या से वाल्मिकी और शिवबा से छत्रपति शिवाजी ऐसे ही नहीं बनते! सचिन तेंडुलकर या सीता देवी ऐसे ही नहीं पैदा होती! सही गुरु का मार्गदर्शन, मेहनत और प्रशिक्षण मिलता हैं तब बनता हैं उत्कृष्ट शिल्प.. मूल्यांवान हीरा!