त्रिशलानन्दन महावीर!
त्रिशाला-नन्दन, सब दुःख-भंजन, वीर-धीर-महावीर !
सिद्धारथ-कुलदीपक, ज्ञातनन्दन, ज्ञानी-धीर-गंभीर!

करुणा-सागर,भव-तारणहार तू, तीर्थंकर -महावीर,
मानवता का शक्तिपुंज तू, त्यागी-वीतरागी-पैगम्बर-पीर!

जिनशासन नायक,जगत जेता, जननी-जन्मभूमि सपूत!  
सत्य, अहिंसा, अपरिग्रह, अस्तेय, ब्रम्हचर्य पंच महाव्रत दूत!

संयम पथगामी, केवलज्ञानी, तीर्थंकर रूप अनूप!
माता-पिता हिय ठारे, भव तारे, जग-उद्धारक रूप!

नन्दिवर्धन से ले आज्ञा,हो विनीत,चले संयम पथ पर,
छोड़ राज-पाट-धन-सम्पदा, वर्षीदान दे, ठारे रयत उर!

कानन-कानन, वन-वन-उपवन, भटके नंगे पैर अधीर!
तप-त्याग में लीन, वस्त्रविहीन, सत्य-खोज में अग्रेसर महावीर।

क्षमावन्त भगवंत सहे परिसह, शूल-फूल,अनन्त उपसर्ग,
'क्षमा वीरस्य भूषणम्' निनाद से गूंजे त्रिलोक-धरा-स्वर्ग!

दृष्टि-विष धारी चंडकौशिक हुआ क्रोध से मति-विहीन !
अंगूठे से बहे क्षीर, विषधर डंक-फुंकार हुयी प्रभावहीन!
 
बारह वर्ष कर उग्र तपस्या, पञ्च माह बाद अभिग्रह-पारणा!
चन्दनबाला वोहराया बाकुला, जिनेन्द्र ने की तप-उद्यापना!

सम्यक ज्ञान, दर्शन, चारित्र्य, तप, अनेकान्तवाद के प्रणेता!
विश्व-कल्याणकारी,जीवदया-पुजारी, जड़-चैतन्य के ज्ञाता!

समवसरण में, अशोक वृक्ष तले, केवलज्ञानी दे देशना! 
देवी-देवता-साधु-साध्वी-मनुज-पशु-पक्षी ले उद्बोधना!

पशुबलि, नरबलि, जातीभेद, हिंसा का पुरजोर विरोध,
'जियो और जीने दो' का जगत में किया अखंड जय घोष!

साधु-साध्वी-श्रावक-श्रविका-की चतुर्दिक धर्म संघ की स्थापना
जिनशासन में कर्म-सिद्धांत, गुण-सम्मान की साकार कल्पना!

महावीर जन्म-कल्याणक महोत्सव से सुरभित समस्त संसार,
रत्न-त्रय चिन्तामणि से आलोकित सारा जड़-चेतन संसार!

स्वरचित तथा मौलिक,
द्वारा कुसुम अशोक सुराणा!



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