रश्मि खुद को आईने में अपलक निहार रही थी.. वक्षस्थल और नितम्बो के अर्धगोलाकार उभार उसे आश्चर्यचकित कर रहे थे...चेहरे की स्वर्णिम आभा उसे उदयाचल के सूर्य की सुनहरी रश्मियों की याद दिला रही थी...उसके तेज कटार सी घायल करती आँखों की पुतलियों की चमक किसी अनजान शख्श को भी आकर्षित करने का माद्दा रखती थी!
आज कॉलेज में 'साड़ी डे' था....उसने माँ की नई गुलाबी रंग की जरी-किनारी वाली साड़ी पहनी थी...
साड़ी में स्त्री कितनी आकर्षक लगती है न.. वह मन ही मन सोच रही थी...सोशल मिडिया पर वीडियो देख कर उसने साड़ी पहनने का बेहतरीन तरीका सीख लिया था! साड़ी को मैच करते आभूषणों ने मानों उसके यौवन पर चार चाँद लगा दिए थे!
तभी जेसीका की मीठी सी आवाज़ आई और वह नई पर्स लटका कर, माँ को फ्लाइंग किस दे कर सहेली के साथ कॉलेज की ऒर निकल पड़ी!
कॉलेज उसके बंगले से सिर्फ एक किलोमीटर की दूरी पर था..बिच में कृष्णा-कोयना का संगम, आसमान में लालिमा बिखेरती रवि-किरणे, परिंदों की चहचहाट, गाँव और खेतों मेंअड़ियल से खड़े ईख के खूंटे के बिच का पुल और उसे लाँघते ही महाविद्यालय का विस्तीर्ण खेल का मैदान! खेल और खेल के मैदान से उसे बेतहाशा प्यार था!
सुबह की लालिमा और गालों पर बिखरा गुलाबी रंग उसके व्यक्तित्व को निखार रहा था.. वह बातें करते-करते कॉलेज की तरफ बढ़ रही थी मगर उसकी नज़रे किसी और को बेसब्री से ढूंढ़ रही थी..
जरासी पत्तों की सरसराहट होती, गाड़ी-बाइक का भोंपु बजता और उसके नयन उस ऒर रुख कर लेते...
आखिर कौन था वह जिसे देखने के लिए रश्मि अधीर हुई जा रही थी मानों फूलों की खिली-खिली पंखुड़ियाँ भंवरे का गुंजन सुनने के लिए उतावली हो रही हो..कौन था वह जिसके शहद से मीठे बोल उसके अंतस को गुदगुदी कर तन्हाईयों में कहकहें लगाने को मजबूर करते थे...
शेष अगले भाग में.