मेरी लाडो! मुझे माफ़ कर दे!

ग्रामीण परिवेश में पली-बढ़ी भंवरी ने परिवार के छल-कपट, प्रताड़ना से तंग आकार जब से गर्भपात कराने का निर्णय लिया, नींद से मानों भंवरी की ठन गई थी!

दिनभर संयुक्त परिवार में गधा- मजदूरी करते-करते वह थक कर चूर हो जाती और उसकी पलकें झपकने लगती मगर जरासी नींद की झपकी लगते ही डरावने सपने उसे सोने नहीं देते! अक्सर अवचेतन अवस्था में  कोई नन्ही गुड़िया उसे झकझोर कर कुछ सवाल पूछती!

डरावनी इस गुड़िया के बाल बिखरे हुयें हैं, आंखें आग उगल रही हैं, नथुनियाँ फूली हुई हैं, रक्तिम होंठ चौड़े कर वह अपने अभी-अभी आएँ आधे-अधूरे, टूटे दाँत दिखा कर उपहास से हँस रही हैं और भंवरी के कंधों को जोर-जोर से हिला कर पूछ रही हैं,'जननी-जन्मदात्री हैं न तू! ममता की मूरत है या बेटी की हत्यारन? दुनिया में आने से पहले ही मार देगी मुझे? स्त्री-भ्रूण का पता लगते ही परिवार के दबाब के आगे हथियार डाल दियें तूने? हे अबला नारी! रक्षक ही भक्षक बन गई मेरी? कोख में ही कुचल देगी मुझे? एक मौका तो दे खुद को और अपने अंश को शाबित करने का! कायर कहीं की! अत्याचार, शोषण, अन्याय ही नियति होती हैं कायर, अबला, डरपोक की... कोई नहीं बचाएगा तुझे इन दरिंदों से, सफ़ेदपोश डकैतों से! निर्मम हत्यारन! कर्मजली!! कहाँ हैं तुझ में विराजित दुर्गा, काली? शक्ति-स्वरूपा, खल-मर्दिनी तू? हाँ.. हाँ..हाँ...अपने भ्रूण को तो बचा नहीं सकती और चली हैं खुद को जगत-जननी कहलाने! धिक्कार है तुझ पर! "

भंवरी जाड़े की ठिठुरती आधी रात में पसीने से तर-बतर हो तपाक से उठ खड़ी हुई!

"नहीं! मैं कायर नहीं हूँ मैं हे डरावनी गुड़िया!

शुक्रिया! गुड़िया! तुमने मेरी आँखों पर जमी धूल की काली परत को हटा दिया है! बेटी! मेरी लाडो! मुझे माफ़ कर दे! मैं लड़ूँगी...मैं लड़ूँगी सब से... तुम्हें इस दुनिया में लाने के लिए! बेटी! मेरी लाडो! मुझे माफ़ कर दे!

 

 

इस पर लोग क्या कह रहे हैं
  • बहुत खूब वीणा जी! पुरानी स्मृतियों में आँसू और मुस्कान का इंद्रधनुषी जलवा नज़र आता हैं।
  • बेहतरीन
  • बहुत सुन्दर कविता लिखी है। मैं आपकी लेखनी की सराहना करता हूँ।
  • आपकी लेखनी प्रशंसनीय है
  • वाह! ❤️❤️