ये प्यार ही तो ज़िन्दगी.. भाग ११
भाग ११

मुम्बई का माटुँगा में स्थित कला, वाणिज्य तथा साइंस का नामचीन महाविद्यालय था वह जहाँ वैदेही और उसके सभी साथी पढ़ते थे। सब अलग-अलग क्षेत्र के छात्र थे लेकिन कला, संगीत और अभिनय के दीवाने! यह वह रेशम डोर थी जिसने इन सभी कला-प्रेमियों को एक-दूजे से जोड़ कर रक्खा था। वैदेही अपनी इस टोली को ही नहीं, अपने कॉलेज को भी बहुत मिस कर रही थी..लेकिन दिवाली की छुट्टियां हो चुकी थी और महाविद्यालय के अहाते में चहल-पहल कम, ख़ामोशी ज्यादा थी।

सुबह का खाना हो चूका था और वैदेही माँ को काम में मदद कर रही थी...माँ आज कुछ थकी-थकी सी लग रही थी... दिवाली में काम का बोझ कुछ ज्यादा ही हो गया था.. इतने दिन के मानसिक तनाव ने उसे और भी थका दिया था! माँ के ना-नुकुर करने के बावजूद वैदेही ने तुलसी, अदरक, पुदीना डाल कर मस्त मसाला वाली चाय बनाई और माँ को जबरदस्ती पिलाई और खुद भी चाय की चुस्कीयाँ लेते-लेते टेबल पर रखी महादेवी वर्मा के उपन्यास को पढ़ने लगी।
पढ़ने में वह इतनी खो गई कि दरवाज़े की बेल बजी लेकिन उसका ध्यान ही नहीं गया... बेल फिर बजी और इस बार माँ हड़बड़ा कर उठ कर बैठ गई..
"वैदेही! कुठे लक्ष आहे तुझं?" कहते-कहते वह दरवाजा खोलने चली गई।

सामने खड़ी महिला वैदेही के बारे में पूछ रही थी... माँ ने वैदेही को आवाज़ दी... "वैदेही... बाहेर ये जरा..."
वैदेही उन्हें देख कर ही बहुत खुश हुई! "आई! यश ची मम्मी... ऑन्टी! आईये न...यश कहाँ है " तभी उसकी नज़र फाटक खोल कर आते व्यक्ति की तरफ गई...धीरे-धीरे कदम बढ़ाते-बढ़ाते कोई उसकी तरफ देख मुस्कुरा रहा था! वह दौड़ी चली गई उसकी तरफ और हाथ पकड़ कर उसे घर के अंदर ले आई।

"अरे पगली!  साढ़े छ: फूट के नन्हें बच्चे का हाथ पकड़ कर ले जा रही हो... और वह वैदेही का हाथ पकड़ कर जोर-जोर से कहकहें लगाने लगा! 
दोनों इन बावरों को देखती ही रह गई... एक पल के लिए 
रच्चनहारे से शिकायत कर नि:शब्द हो सोफा पर विराजमान हो गई। दुर्घटना के बाद दोनों आज पहली बार एक-दूजे से मिले थे।

यश यहाँ उच्चशिक्षा के लिए आया था... माटूँगा में ही वह एक किराये के कमरे में पेइंग गेस्ट के रूप में रह रहा था! वैसे तो पिता के दोस्त ही थे कमरे के मालिक लेकिन यश के पिताजी व्यवहार बहुत साफ-सुथरा रखना पसंद करते थे... उनका पक्का मानना था कि पैसा ऐसी चीज है कि वह मजबूत रिश्तों को भी तोड़ देती है और इसीलिए वो पैसे का व्यवहार आपस में भी सदा पारदर्शी रखते थे।

वैदेही की माँ ने नाश्ते की प्लेटे सजाई और दोनों को आवाज़ दी! वैदेही बोल पड़ी.. "माँ हमें यहीं दे दो न.. और वह माँ के हाथ से ट्रे लेने चली गई....माँ ने एक ट्रे में चिवड़ा, करंजी और बूँदी की प्लेटे सजा कर उन्हें दे दी और दूसरी ट्रे बाहर डाइनिंग टेबल पर रख कर दोनों बातों में मगन हो गई।

वैदेही ने खूब सारी बातें की... मन में मानों ज्वालामुखी उबल रहा था... कितने दिनों बाद दिल की बात दिल खोल कर करने का मौका मिला था उसे! यश की हिम्मत और जिगरा देख वह ऊर्जा से भर गई! कितनी पीड़ा हो रही थी उसे चलने में... पर बन्दे के चेहरे पर जरा भी मायूसी नहीं.. बस! बात-बात पर हँसता रहता है..मानों हर मुस्कुराहट के पीछे दर्द का दरया छुपाने की कोशिश कर रहा हो।

जीवन की इस एक दुर्घटना ने इन युवाओं का बहुत कुछ छिनने की कोशिश की.. उनके हौंसले को कड़ी चुनौती दी लेकिन वो भी न जाने किस मिट्टी के बने थे... वक़्त के आगे हथियार डालने के बजाय उसे ललकारने का बीड़ा उठा चुके थे! यश की जिंदादिली को देख कर वैदेही ने भी मन में ठान ली..

"हार नहीं मानेंगे ..... काल के कपाल पर लिख देंगे अपना नाम..."

बहुत दिनों बाद नाश्ते का लुत्फ़ उठाते हुए यश को बड़ा मजा आ रहा था... वैसे जयपुर से लाया घेवर और पेठा यश की माँ कमला जी ने वैदेही के परिवार के लिए भी लाया था पर फ्लाइट की बंदिशों के कारण कम मात्रा में ही ला पाई थी वह!
यश और वैदेही ने फिर से नए-नए प्लान बनाने शुरू कर दिए थे... उसने विनय और वज्र के बारे में भी पूछा... वज्र से मिलाने का वादा तो किया वैदेही ने पर विनय की बात आते ही वह खामोश हो गई! यश उसके चेहरे के हाव-भाव से ही समझ गया कि वैदेही कुछ छुपाने की कोशिश कर रही है।

"सीधे-सीधे आँखों में आँखें डाल कर बात नहीं कर रही हो ... उसने वैदेही का हाथ पकड़ कर कहा, " मुझ से सच्चाई छुपाना मत वैदेही ... मैं अब फौलाद बन गया हूँ.. किसी भी बुरी ख़बर का सामना करने में सक्षम! प्लीज... वैदेही! मेरा विश्वास मत तोड़ना! हँसते-हँसते यश अचानक भावुक हो गया था! वैदेही भी इस सच को सीने में दबा कर रखने की जुगत में आज स्वयं ही बाज़ी हार चुकी थी। उसने यश से वादा लिया कि वह वज्र को अभी कुछ नहीं बताएगा और विनय से जुड़ी सारी सच्चाई यश के सामने बयाँ कर दी.. उसे यह भी बताया कि आज वज्र अगर जिन्दा है तो विनय के अंगदान की वजह से..उसके माता-पिता की वजह से... कुछ पल के लिए मानों सन्नाटा सा छा गया था ... अब तक खिलखिलाते, चहचहाते परिंदे खामोश हो गए थे... तभी माँ की आवाज़ ने खामोशी को चकनाचूर कर दिया... "आबा आले आहेत वैदेही!" माँ की आवाज़ सुनते ही दोनों चौकन्ने हो गएँ... यश ने चेहरे पर हँसी का मुखौटा धारण कर दिया और वैदेही अपने दुप्पटे से आँखें पोंछ कर बाहर आ गई! यश भी अब ड्राइंग रूम में आ चूका था।

आबा दिवाली की भेंट देने आए थे! उन्होंने एक चाँदी का सिक्का जानकी को थमा दिया और यश और उसकी मम्मी को देख ड्राइवर को फ़ोन कर गाड़ी से एक बॉक्स और ला कर देने को कहा! आबा भी यश की मम्मी को पहली बार ही मिल रहें थे.. अस्पताल में यश के पापा प्रताप सिंह शर्मा जी ही थे.. उनसे आबा की मुलाक़ात जरूर हुई थी! आबा ने एक बॉक्स यश की मम्मी को दिया और बहुत मनुहार करने पर कोल्ड ड्रिंक पीकर वो चले गये।
वैदेही की माँ ने दोनों को रात का खाना खाने के लिए रुकने को कहा लेकिन दोनों ने काम का बहाना बनाया और घर की तरफ ओला बुक कर निकल पड़े...
वैदेही के मानस सागर में आज अनगिनत लहरें कुलांचे भर रही थी... आखिर किस-किसको रोक पाती वह..किस-किस से दामन चुराती....

स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई, महाराष्ट्र|
शेष कहानी अगले अंक में....


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