प्राची ने बिखेरी सहस्त्र हाथों से लालिमा,
हरी-भरी दुब पर बिखरी नवल अरुणिमा!
पत्तों पर ओस-बुँदे बिखरी मोती-लड़ियाँ,
स्फटिक सी चमक, खुशियों की कड़ियाँ!
किरणों की छुअन से पुलकित कलियाँ,
वसंत के चुम्बन से रोमांचित हैं बालियाँ!
डाल पे झूले परिंदे, एक परिवार के बन्दे,
पंखों से उड़ान भरे नील गगन के बाशिंदे!
प्रकृति-सौंदर्य-बोध, करें मनुष्य को हर्षित,
जीने का दे मानव को सन्देश सारगर्भित!
दृष्टी बदलिए, सृष्टी बादल जाएगी यारों,
ज़िन्दगी ईश्वर-देन, जी लो हँस के प्यारों!
प्रकृति से सीखो खुशियाँ लुटाना-बाँटना,
ओसबून्द सी ज़िन्दगी जाया मत करना!
ज़िन्दगी बरगद या बुलबुले सी क्यों न हो,
हर पल झूम-झूम जीना, खिलखिलाना!
अपना निहित कर्तव्य कर जहाँ से जाना,
क्यों फल-चिंता विफलता पर रोना-धोना!
प्रकृति आँसू बहायेगी, मानव कभी नहीं,
क्यों भविष्य की सोचे, वर्तमान सत्य यहीं!
स्वरचित एवं मौलिक,
द्वारा कुसुम अशोक सुराणा,मुम्बई।