चित्र आधारित दोहा सृजन!
इंद्रधनुषि हैं राजसी, तितली के सब रंग।
फूल-फूल पर बैठती, गुन-गुन गाती संग।।
कोमल सुन्दर पंख हैं, तितली आतुर आज।
चुन पराग कण ओढ़ती, सपनों का मृदु साज।।
डरता छूने को उसे, मेरा कोमल हाथ।
रंग भले चढ़ जाय जी, घायल मनवा साथ।।
देख सृष्टि की लालिमा, जागी नूतन आस।
पी कर मधु तितली उड़ी, आया सावन मास।।
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।