ढलता सूरज....

दिलों के दर्द को न बढ़ाओ... मान जाओ न...

तन्हाईयों में हमें न तड़पाओं... लौट आओ न...

 

कम्बख्त जवानी गुजर गई चंद रुपएँ कमाने में,

बची-खुची, नौनिहालों को कंधों पर घुमाने में! 

दिल की कर न पाएं न हमसफ़र की.. ज़माने में,

अरमानों की पोटली दबा रक्खी थी सिरहाने में!

 

दिल के बोझ को न बढ़ाओ...जान जाओ न...

देहरी के दीये को न बुझाओ, चले आओ न...

 

आँखों की पुतलियों में डाला मोतियाबिंदु ने डेरा,

लाखों की पुश्तेनी हवेली बेच बच्चों ने मुँह फेरा!

हजारों की पेंशन से हो रहा हम बुजुर्गों का गुजारा,

दुनिया से जो न हारा वो अपने बच्चों से है हारा!

 

दिल की धड़कनों को न बढ़ाओ, पहचान जाओ न,

वक़्त-वक़्त की बात हैं, वक़्त को जान जाओ न! 

 

चाँदी पहन ली है बलखाती नागिन सी जुल्फों ने,

अधर-सीपी से बिखरे बारी-बारी श्वेत अनार दाने!

तन की झुर्रियों से रिसती वक़्त-बेवक़्त पीड़ पुरानी

मन की राख में अंगार जलाती, अपनों की मनमानी!

ढलते सूरज को विदा करने का तरीका सीख लो, दिलों को ठण्डक पहुंचा जीने का सलीका सीख लो!

 

 स्वरचित तथा मौलिक,

कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई, महाराष्ट्र!

 

इस पर लोग क्या कह रहे हैं
  • धन्यवाद!
  • बहुत खूब.. दीप से दीप जलेंगे तो जीवन रोशन हो जायेगा! प्रेरणादायक सुन्दर प्रस्तुति!