शिशिर की रातें... शिशिर की रातों में, गुलकंद सी बातें,
शशि की बाहों में, सुलगती मुलाकातें!

प्रीतम की निगाहों में कैद षोडशी प्यारी,
भूल-भुलैय्या संसार में,प्रीत की रीत न्यारी।

दिल में मची है मधुर यादों की हलचल,
शिकवे-शिकायतें, जुदाई के लम्बे पल।

तन्हाईयों में अक्सर तड़पता है दर्द-ए-दिल,
प्रीत की छुअन को तरसता है प्यासा दिल!

वफ़ा की उम्मीदें वो चाहतों का कारवाँ,
तेरे बिन साजन, कैसे होगा जवाँ-जवाँ?

वो सावन-भादों बिन प्यासी धरा की आग,
कैसे मुस्कुरायेगा वो अश्क-भीगा सुहाग?

बसंती हवाओं से खिले-खिले हैं पलाश,
बहारों के आने से लुभाने लगा आकाश।

केसर की क्यारियों से महकने लगी है  घाटी,
सुरभित हुआ तन-मन, सौंधी-सौंधी है  माटी।

जनम-जनम का साथ जानम, छूटे न हाथ रे!
रिश्ते की डोर रेशमी, रुके न कभी गांठ रे।

तेरी मधुर यादों में डूबा-डूबा सुरमयी मन!
विरह की अगन में जल रहा मरमरी बदन।

धड़कनों के साज़ पर छेड़ा है गीत  निराला,
दो ज़िस्म, एक जान,  है जीवन संगीत सुरीला।

स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।
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