बलात्कार बलात्कार ही है...

बलात्कार बलात्कार ही है, राजधानी में हो या गली, कुचे में, बंद कमरों में ...

अत्याचार की क्या अलग परिभाषा होती है?

दर्द की इन्तहा वही शुरू होती है .....

इंसानियत जहाँ दम तोड़ती है ....

मिडिया में आये या न आये ....

कराहती बच्ची या दामिनी को देख ..

कौन पत्थर दिल है जो मोम सा पिघलता नहीं है?

कुछ आहें दब जाती हैं वक्त के ढेर तले…

कुछ कब्र में भी चीत्कार करती हैं ....

कुछ राख में भी चिंगारी जला देती हैं 

फर्क सिर्फ इतना …कुछ सुनाई देती हैं ..कुछ फिजा में घुल कर जज़्ब हो जाती हैं .....

 

इस पर लोग क्या कह रहे हैं