ये प्यार ही तो ज़िन्दगी... भाग ४४
भाग ४४

'मुम्बई दर्शन' का वह अंतिम पड़ाव था! सभी 'मरीन ड्राइव' पर पहुँच चुके थे... सूरज झटपट क्षितिज के उस पार जा कर छुपने को मानों उतावला हो चूका था क्योंकि रात उसे केसर घुला मोतीचूर का लड्डू समझ मुँह में डालने को लालायित हो रही थी! 
समंदर में इक्का-दुक्का नौकाएं डोल रही थी! सूर्य को अपने आगोश में ले रात अपने शामियाने में सुस्ता रही थी! पूनम का चन्द्रमा अपनी आभा बिखेर रहा था। चांदनी मन ही मन मुस्कुरा रही थी! सागर तट पर बिखरे कंक्रीट के पत्थर और बड़ी-बड़ी चट्टानों को लिपट-लिपट कर, उत्तेजित हो लहरें उन्हें चुम रही थी और फिर नटखट बच्चें सी समंदर में लौट रही थी मानों किसी बुजुर्ग के आशीर्वाद लेकर अपने आशियाने की ऒर प्रस्थान कर रही हो! आसपास की ऊँची-ऊँची अट्टालिकाएं रोशनी में जगमगा रही थी और उनका अक्स सागर की सतह पर नज़र आ रहा था, मन को लुभा रहा था। सभी 'क्वीनज नेकलेस' को देख अभिभूत हो रहे थे। एक तरफ प्रकृति का रोम-रोम पुलकित था तो दूसरी तरफ सभी अपने यौवन के रोमांचित करते पलों को याद कर निशब्द हो गएँ थे!
विनय के माता-पिता सम्मोहित थे! एक ऒर प्रकृति उन्हें गमों को भूला कर जीवन को सकारात्मक दृष्टिकोण से देख आगे बढ़ने की प्रेरणा दे रही थी तो दूसरी ऒर यादों के अनगिनत दीप अपनी लौ से अँधेरे को चुनौती देने का प्रयास कर रहे थे!

जानकी जी पुरानी यादों में आकंठ डूब चुकी थी! मधुचन्द्रमा की रात के बाद श्री के साथ वह इसी सागर तट पर उसकी बाहों में पनाह लें दुनिया को भुला बैठी थी! ठण्डी हवा के झोंके उसकी नागिन सी बलखाती, उलझी लटों से खेल रही थी! सिर्फ पूनम का चन्द्रमा साक्षी था उनके इन मादक प्रेम-मदिरा में डूबे पलों का! 

आबा की आवाज़ से वह फिर इस जहाँ में लौट आई वरना यादों का असीम सागर उसे न जाने किस जगह लें जा कर पटक देता, कौन जाने! "पोरी! निघू या का आता?" आबा के इस वाक्य ने उसे फिर पृथ्वी लोक में ला पटका।
"हो आबा! निघू या आता! रात्र झाली! वैदेही एकटीचं आहे घरी! " जानकी जी बोल पड़ी और सभी सागर तट की रच्चनहारे की अद्भुत चित्रकारी को आँखों की पुतलियों में अंकित कर निकल पड़े घर की ऒर! जानकी जी ने सभी के कई छायाचित्र लें कर इन पलों को मोबाइल में कैद कर लिया था! एक तरफ सृष्टि का अनुपम सौंदर्य बाहें फैलाएं पुकार रहा था तो दूसरी ऒर लहरों का मनभावन, लयबद्ध संगीत! जानकी जी ने कई विडिओ भी लिए थे! उनकी फोटोग्राफी की रूचि देख राजरानी जी भी प्रभावित हुई और उन्होंने भी अरब सागर के सुन्दर मंजर को कैद कर लिया अपने मोबाइल में!

आबा ने आज हॉटेल से 'चेक आउट' कर दिया था! वीर बहादुर सिंह जी तथा राजरानी जी आज आबा के यहाँ रुकने वाले थे। उनकी भोर में चार बजे की फ्लाइट थी! 
सभी बहुत खुश थे। आबा ने हर जगह अपनी दर्यादिली का परिचय दिया था! अपने घर के करीब के होटल में उन्होंने सब के लिए शुद्ध शाकाहारी भोजन की व्यवस्था की थी| सभी थक कर चूर हो चुके थे। मन में कोलाहल मचा था! एक तरफ मौज-मस्ती-भटकन्ती का अंतिम दिन था तो दूसरी ऒर घर की जिम्मेदारियां सुरसा सी मुँह फैलाएं उनका इंतज़ार कर रही थी। सभी ने भोजन का आनन्द लिया। वीरबहादुर सिंह जी ने तथा उनकी पत्नी राजरानी जी ने सभी का तहेदिल से आभार व्यक्त किया और सब को गर्मी की छुट्टियों में नेपाल आने का प्यार भरा नौता भी दिया! उन्होंने आबा और प्रतिभा जी का खास आभार व्यक्त किया! अप्पा भी भावुक हो चुके थे! उन्होंने सब को हॉस्पिटल के निर्माण के लिए चल रही अपनी कोशिशों के बारे में अवगत कराया और सब की शुभेच्छा के लिए विनती की! 
भोजन सम्पन्न होने को था! प्रतिभा जी ने सभी सहेलियों को हल्दी-कुंकुम लगा कर साड़ी और चाँदी का सिक्का भेंट किया और आबा ने सभी भद्रजनों को श्रीफल, शाल और चाँदी का सिक्का प्रदान किया! आबा की व्यवस्था और प्रेम से सभी गदगद थे! सब का मन भारी था लेकिन एक-न-एक दिन तो रोजमर्रा की ज़िन्दगी की ऒर लौटना ही था!  
आबा की एक गाड़ी सब को घर पहुंचा कर घर लौट चुकी थी और दूसरी गाड़ी में नेपाल से आए मेहमान बैठ चुके थे! आबा, प्रतिभा जी और जानकी जी के आते ही गाड़ी हवा से बातें करते-करते घर तक पहुँच गई थी! 
वज्र और वैदेही ने सबका तहेदिल से स्वागत किया जिससे सभी बहुत उत्साहित हो गएँ और सब ड्राइंग रूम में बैठ कर आराम करने लगे तभी वज्र के दादा-दादी अंदर के कमरे से बाहर आएं और सभी आश्चर्यचकित हो एक-दूसरे को देखने लगे! 
तभी आबा के चेहरे पर प्रश्नचिन्ह देख वज्र के दादाजी भास्कर राव बोल पडे," कसं काय वाटलं आमचं सरप्राइज? " और सभी दिल खोल कर हँस पड़े! विनय के माता-पिता से दादा-दादी पहली बार मिल रहे थे। सभी ने चरणस्पर्श किया और सब सोफा, आराम कुर्सी पर बैठ गएँ। प्रतिभा जी तथा जानकी जी रसोई की तरफ बढ़ी! आबा ने माता-पिता से बात की, विनय के माता-पिता का उनसे परिचय कराया और उनकी प्लाइट के बारे में जानकारी दी! 
दादा जी उनके लिए अपनी पसंद से चाँदी की तश्तरी तथा हल्दी-कुंकुम का करंडक लें आये थे! उन्होंने प्यार से दोनों को भेट दी और उनका शुक्रिया अदा कर अपने कमरे में चले गएँ। उन्होंने भोजन किया और फिर वो आराम करने अपने कमरे में चले गएँ ! आबा के माता-पिता बहुत खुश थे उनका अभिनन्दन कर! होंगे क्यों नहीं? आखिर उन्होंने ही तो उनके पोते को जीवन-दान दिया था! आज उन्हें कुछ हल्का-हल्का लग रहा था क्योंकि उनके ह्रदय पर से कृतज्ञता का कुछ बोझ तो उतरा ही था !
आबा ने दोनों का सामान एक कमरे में रखवाया और दो बज कर पंद्रह मिनिट पर प्रस्थान के लिए निकलने की बात कह कर उनके लिए दूध वगैराह की व्यवस्था करवाई और कुछ समय आराम करने के लिए अपने कमरे में चले गये!
प्रतिभा जी भी काम निपट कर अपने कमरे में पहुँच चुकी थी! कई दिनों बाद आज उनका पूरा परिवार साथ था। वह बहुत थक चुकी थी लेकिन वह जानती थी आबा को कुछ ही समय के बाद एयरपोर्ट जाना है! वह शांत चित्त से सो गई!
आबा ने अलार्म लगा दिया था और ड्राइवर को दो बजे पहुँचने को कह दिया था! अब कार्य सम्पन्नता की ऒर बढ़ रहा था! वो मंजिल के अंतिम पायदान पर खड़े थे! सब कुछ उनके मन-मुताबिक और सही तरीके से हो रहा था! 
समय पर अलार्म बज गया और आबा उठ कर तैयार हो गएँ! उन्होंने वीरबहादुर सिंह जी को भी कॉल किया! वह भी तैयार थे! चाय-बिस्किट का आनन्द लेकर सभी एयरपोर्ट की ऒर निकल पड़े!
विनय के माता-पिता अभिभूत थे! पल-पल सभी के द्वारा मिला सम्मान उन्हें भावुक कर रहा था! एयरपोर्ट पहुँच कर अब वह पल भी आ गया जहाँ उन्हें अकेले ही आगे बढ़ना था! कुछ ही दिनों का मेलजोल उनके बीच एक अटूट रिश्ता जोड़ गया था! दो देशों की सिर्फ सीमाएँ ही एक दूसरे से सटी हुई नहीं थी बल्कि दिल भी जुड़े थे आज! वीरबहादुर सिंह जी ने फिर एक बार आबा को नेपाल आने का नौता दिया और बार-बार पीछे देखते-देखते भारी मन से दोनों चल पड़े अपने गतंव्य की ऒर मानों बहुत  कुछ कीमती पीछे छूट गया था उनका भारत में ...

आबा भी कुछ पल वहीं खड़े रहे निस्तब्ध, निशब्द.. न जानें क्यों उनकी नजरें अभी भी उन्हें ढूंढ़ रही थी... ड्राइवर की आवाज़ सुन वह सचेत हुए और चल पड़े घर की ऒर... एक अनजान शून्य में अपना जहाँ ढूंढने!

आबा घर लौटे और धीरे से फाटक खोल कर घर का मुख्य द्वार खोलने के लिए जेब में हाथ डाल ही रहे थे कि दरवाजा खुलने की आवाज़ आई! प्रतिभा जी द्वार पर खड़ी थी! आबा को जाते हुए देख कर भी वह चुपचाप सोने का नाटक करती रही ताकि आबा टेंशन न लें... लेकिन सच तो यह था कि आबा के एयरपोर्ट जाने के बाद उन्हें नींद आई ही कहाँ थी? उनकी नींद तो आबा उड़ा लें गएँ थे! 
आबा बोल पड़े, "वेडी! झोपली नाहीस अजून" और उनका हाथ पकड़ कमरे की ऒर चल पड़े! उनके बालों में उंगलियाँ घुमाते हुएँ उन्हें पुचकारने लगे! सासवड में अकेली कैसे रहती हो? बस! आबा ने कहा और प्रतिभा जी की आँखों से गंगा-जमुना बहने लगी! आबा ने उन्हें रोका नहीं! उन्हें सीने से लगा वो पल दो पल वैसे ही खड़े रहे और फिर उन्हें बाहों में भर कर उन्होंने बत्ती बुझा दी!

आँसूओं के सैलाब में गिले-शिकवे बह चुके थे और दोनों एक-दूजे के आलिंगन में अपनी दुनियादारी भूला चुके थे! 
रातरानी ने इत्रदानी से इत्र उंडेल दिया था, सर्द हवा पेड़-पत्तियों के ह्रदय में स्पंदन पैदा कर रही थी और परिंदों ने अपनी मधुर तान छेड़ दी थी! प्राची आज अलसाई सी गर्म रजाई में लिपट पहुड रही थी और भोर उसके जागने की प्रतीक्षा कर रही थी! विरह की अग्नि शीतल हो चुकी थी और सृष्टि के जलतरंग पर जीवन-प्रभाती के सुर थिरक रहे थे। पहली बारीश की बूंदों से धरती का अंग-अंग महक रहा था और गालों पर सूर्योदय की लाली अपना कमाल दिखाने को आतुर थी।


स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।
अगला भाग अगले अंक में...


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