खुदा की मेहर... पलकों में ठहरी मोतियों की लड़ियाँ  फिसलने को बेताब,
प्राची की तनी भृकुटी जब छेड़ा-छेड़ी करे  आफ़ताब!

पवन संग बह चला परागकणों का  सैलाब!
निशा खेले छुपा-छुपी, कहकहें लगाए माहताब!

पंखुडियों ने खोले राज, भंवरा हुआ बेनकाब,
दास्तां-ए-दिल सुना सजाने लगा मधु-मय ख़्वाब!

हुस्न-ए-मलिका की बाहों में विस्मृत दिल की फ़रियाद!
खुदा से मांगने लगा रियायतें, बढ़ी-चढ़ी जीवन-मियाद!

रुह से रुह का मिलन, दोहराएगी कहानी बार-बार!
जनम-जनम के बंध, मजबूत डोर से बंधेगे बारम्बार!

दिल की फ़रियाद, टूटे ख़्वाबों का मातम किसलिए?
देहरी पे जलता एक दीपक काफ़ी रोशनी के लिए!

तपती धूप में आग उगलता पलाश हो या हँसता गुलमोहर,
ज़िन्दगी का स्पंदन हो या सृजन, बरसती रहे खुदा की मेहर!

स्वरचित तथा मौलिक,
द्वारा कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई |

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