ये प्यार ही तो ज़िन्दगी..भाग ६८
भाग ६८

प्रताप सिंह शर्मा जी का यश एकलौता बेटा था। उनकी जो भी कुछ उम्मीदें थी यश से ही जुड़ी हुई थी। लक्ष्मी जी की कृपा उन पर अनवरत बरस रही थी। यश के अपाहिज होने के बाद भी वह परम पिता परमात्मा के ऋणी थे कि उन्होंने उनके घर के चिराग को प्रज्वलित रक्खा। उन्होंने न यश के सामने न सगे-सम्बन्धियों के सामने यश की दिव्यांगता की कभी चर्चा की। खाटू श्याम जी में उनकी असीम श्रद्धा थी। यश की जान बची यह उनके लिए बहुत महत्वपूर्ण था। 

वह मूल्यवान पत्थर हीरे-जवाहरत का कारोबार करते थे और भगवान ने उन्हें हीरे जैसा पुत्र भी दिया था। यश की सकारात्मक सोच उन्हें भी सोचने-समझने पर विवश कर देती थी। व्यापार को सही दिशा में, सही तरीके से आगे बढ़ा पाए इसी लिए यश आगे की पढ़ाई कर व्यापार के क्षेत्र में आई नई-नई तकनीक का ज्ञान ग्रहण कर रहा था! खेल ने उसे बेहद संवेदनाशील तथा सशक्त बना दिया था। मुश्किलों को तो वह चना-कुरमुरा समझ निगल लेता था। तमाम कठिनाइयों के बावजूद इस हट्टे-कट्टे नौजवान ने कभी परमपिता परमात्मा से शिकायत नहीं की। जब भी वह माँ कमला जी की आँखों में मोती से चमकते अश्रु देखता, वह बोल पड़ता, " तुम्हें तो गर्व होना चाहिए माँ ! ऊपरवाले ने परीक्षार्थी के रूप में तुम्हारे बेटे को चुना! माँ तुम ही हमेशा कहती हो न... सोने को तपाया जाता हैं, कथील को नहीं! माँ! अपने आँसुओं से अपने बेटे को कमजोर मत करों! तुम्हारी मुस्कुराहट मेरी शक्ति हैं.. " फिर माँ  से लिपट माँ कों जादू की झप्पी देता! फिर क्या! माँ नवनीत सी पिघल जाती और बेटे को भी आँसुंओं से नहला देती। होठों पर मुस्कान और नयनों से बरसता नीर... मानों सुनहरी धूप में फुहारों के बिच झाँकता इंद्रधनुष..सृष्टि की अजीब छटा थी वह !

यश की इसी जीवट के गौरव सर भी कायल हो गए थे। उन्हें पता था पैरालम्पिक में मेडल लाने के लिए जो तमागों की भूख- प्यास होनी चाहिए वह यश में हैं। उन्हें उसके द्वितीय चयन प्रक्रिया में सहभागिता का इंतज़ार था। वह हर खिलाडी को सही प्रक्रिया से आगे बढ़ाना चाहते थे।शिफ़ारिशों की उनकी अकादमी में बिल्कुल दाल नहीं गलती थी। यहीं वजह थी कि अकादमी की स्थापना के बाद हुएं दोनों पैरालिंपिक खेलों में उन्होंने अपने खिलाडियों के द्वारा तमागों की वर्षा करा दी थी।

तभी विभा का फ़ोन आया। यश के माता-पिता को विभा ने अप्पा का मेसेज दिया  तथा अप्पा फ़ोन प्रताप सिंह जी से खुद भी बात करेंगे यह भी कह दिया था। अप्पा के 'ड्रीम प्रोजेक्ट' का इसी रविवार को भूमिपूजन का कार्यक्रम था कराड में! 

यश के माता-पिता भी अप्पा यशवंतराव जी के प्रयासों से अभिभूत थे। अस्पताल में उनके सहयोग से ही तो वह डरावना, अवसाद भरा समय सुकून और शान्ति से निकला था! 

विभा ने फ़ोन कर उनसे मिलने आने की बात कहीं। उनकी अनुमति के बाद तथा बाद वज्र को मिलने का कार्यक्रम भी बनाया और वज्र कों आने के बारे में अवगत भी कराया। यश के माता-पिता भी जल्दी जल्दी तैयार हो गए हालांकि यश के पिता थके हुए थे लेकिन ऐसे मौके पर देरी करना उन्होंने उचित नहीं समझा! नका मानना था आखिर दुःख के समय किस बुलावे का इंतजार करना हैं ? 

भोजन के पश्चात् वज्र के यहाँ जाने का प्लान बन चूका था। कराड जाने का भी सबका मन था तो सभी साथ जाने का प्रयास कर रहे थे ताकि यह भी एक सुनहरा मौका बन जाये एक-दूसरे के और करीब आने का! वज्र का फ़ोन आते ही जानकी जी और वैदेही भी भोजन कर वज्र के यहाँ पहुँच गई थी। छोटू और अन्नपूर्णा ने सब काम निपट लिया और दीवानखाने को व्यवस्थित कर दिया था।

विभा, यश और यश के माता-पिता 'ओला' कर ठीक तीन बजे वज्र के यहाँ पहुँच गएं। वज्र ने दीवानखाने में दादाजी भास्कर राव जी और दादी जी लक्ष्मीबाई जी की पारम्परिक परिधान में ली गई तस्वीरों को फ्रेम कर लगवाया था। दोनों का राजसी रूप हर किसी को आकर्षित कर रहा था। दादाजी के फोटो पर लगी चन्दन की माला उनके समाज कल्याण के कार्यों की तरह ही अपनी खुशबू बिखेर रही थी और उनकी आत्मा के अमरत्व का प्रमाण दे रही थी। वज्र के लिए यह अहसास ही काफ़ी था, चैन से ज़िन्दगी जीने के लिए। 

सभी ने दीवाणखाने में प्रवेश करते ही तस्वीरों को नमन किया, और सभी सोफे पर विराजमान हो गएं। दीवाणखाने में दोनों तरफ सोफे लगे थे। बीच में बड़ा सा कांच का टी-पॉय था और दादाजी की तस्वीर के सामने रक्खे छोटे से स्टैंड पर एक अखंड दीप जल रहा था। अब वज्र के दिन की शुरुआत दादाजी के तस्वीर के सामने अखंड दीप जला कर ही होती थी। 

छोटू सबके लिए चाय नाश्ता लेकर आया। बिच में ही अप्पा का फ़ोन आया! उन्होंने यश के पिताजी से बात की और कराड भूमिपूजन के कार्यक्रम में पधारने का तहेदिल से न्योता दिया। प्रताप सिंह जी ने भी कार्यक्रम में सपरिवार उपस्थित रहने का आश्वासन दिया।

यश, विभा, वैदेही और वज्र कराड जाने की प्लानिंग में जुट गएं। प्रताप सिंह जी ने भी यह जिम्मेदारी बच्चों कों सौंप दी और कार्यक्रम का ढांचा निश्चित होने पर सूचीत करने को कहा। सभी एक बार फिर साथ में सफ़र करने की कल्पना मात्र से बहुत खुश थे। 

मित्र-मण्डली ऐसे दौर से गुजर चुकी थी कि अब वह किसी मौके को उत्सव में बदलने से चूकना नहीं चाहती थी। ज़िन्दगी की क्षणभंगूरता के दर्शन तो वह कर ही चुकी थी। अब मित्र-मण्डली हर मौके पर पैवेलियन पार छक्का मार कर उस पल को स्मृतियों के पन्नों पर सुवर्ण अक्षरों से अंकित करना चाहती थी।

यश के माता पिता ने वज्र के दादा-दादी के बारे में बात की । उनकी स्मृतियों के एक-एक पन्ने को उलटते-उलटते वज्र की आँखें नम हो रही थी। 

वो घर और घर के लोग बहुत ही भाग्यशाली होते हैं जिन्हें अपने बुजुर्गों की छत्रछाया तले, प्यार-दुलार के शामियाने तले जीवन गुजारने का मौका मिलता हैं। बुजुर्गों की दुआओं और आशिशों का कवच-कुण्डल उन्हें बुरे वक्त की बेशुमार गुस्ताखियों से बचा लेता हैं! उनके अनुभव समंदर में आएं तूफान में दीपस्तंभ सा दिशा-निर्देश दे कर 
सही सलामत किनारे पहुंचा देते हैं। 

यश के माता-पिता ने वज्र का हौसला बढ़ाया। उसे किसी भी वक़्त, कोई भी काम हो तो बेझिझक फ़ोन करने को कह कर वो विदा लेने लगे। वज्र, वैदेही और विभा ने भी यश के साथ उन्हें प्रणाम किया और वज्र ने ड्राइवर को कह कर उन्हें घर तक पहुँचाने को कहा। यश वहीं रुक गया था आगे की प्लानिंग के लिए।

प्रताप सिंह जी अभिभूत थे बच्चों के प्यार से! न जानें किस मिट्टी के बने थे सब के सब ! जरासी भी चेहरे पर शिकन नहीं न किसी से शिकायत। बस! आगे बढ़ने का जज़्बा, जीवट, जिद्द! ऊपरवाला भी  उनकी इस जीजिविषा के सामने मानों अपना हठ छोड़ नतमस्तक हो गया था!

स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।
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