गुरु बिन ज्ञान कहां से पाऊ?
अज्ञान तिमिर कैसे हर जाऊ?
गुरु बिन कहाँ मिले है रिद्धि?
सुवर्ण तपा जगमगाए जो बुद्धि!
मैं बालक मंदबुद्धि, अबोध, अज्ञानी,
वेद-शास्त्र, धर्म-मर्म कछु न जानी!
गीता, कुरान, बाइबल, गुरुवाणी!
आगम, उपनिषद्, ज्ञान की खाणी!
आतम ज्ञान ज्योत, कैसे प्रकटाऊं?
गुरु बिन ज्ञान, कहां से मैं पाऊ?
गुरु बिन कहाँ मिले है सिद्धि?
हीरे को तराश चमकाएं जो बुद्धि!
मैं मूढ़! कैसे बनु पंडित, ब्रह्म ज्ञानी?
गुरु बिना कौन समझाए वाणी?
गुरु! मैं काष्ठ, आप श्री हुनर के धनी!
छील-छील गढत मूरत बहु सोहनी!
सद्गुरु! आप कुम्हार, मैं गीली मिट्टी,
कुशल हाथ दे आकर धर चक्के पे मिट्टी!
गुरुवर! मैं गिले आटे की कच्ची लोई,
उलट-पुलट आग पर फुलका मृदु पोई!
गुरु! तुम बिन कैसे मिले मोक्ष-मुक्ति !
गुरु! तुम कृपा बिन है निरर्थक भक्ति!
गुरु! ब्रम्हा, विष्णु, महेश, ज्ञान प्रदाता!
गुरुकृपा बिन कैसे हो भव पार विधाता?
गुरु सुमिरण सु सफल मनुज जन्म भारी!
गुरु चरण रज देव, धर्म, दर्शन हितकारी
गुरु आशीर्वचन बिन, खुले न मुक्ति-द्वार!
ज्ञान-दीप प्रज्वलित कर करे अनंत उपकार!
गुरु बिन कौन करे जागृत अवचेतन मन?
गुरु उपदेशामृत से करें मनुज प्रकृति पूजन !
गुरु बिन कहां मिले है रिद्धि, सिद्धि, अमिवृष्टि?
गुरु कुण्डलिनी जागृत कर आलोकित करे सृष्टि !
गुरु दरजी बेते थान, बनाये सुंदर परिधान
ज्ञान-चक्षु खोल ले इम्तहान, दे ज्ञान दान!
गुरुकृपा से तरे मनुज, पहुंचे भवसागर पार,
गुरु चरणामृत से होय मनुज जीवन-उद्धार!
गुरु पारस स्पर्श से बने, वाल्या से वाल्मिकी जी!
गुरु शिक्षा-दीक्षा से शिवबा, बने छत्रपति शिवाजी
गुरु चरण रज धारण करू भाल पर, दे दो वरदान!
गुरुदक्षिणा स्वरूप अर्पित करूं मैं निज जीवन, प्राण!
गुरु कृपा से मिले हरि, हरी दर्शन, हरे दुःख-संत्रास!
गुरु चरणामृत मीठी औषधि, हरे रोग, सकल त्रास!
देव, गुरु, धर्म शरण में, मैं अबोध, अज्ञानी, नादान!
देव रूठे, गुरु मार्ग दिखाए, गुरु रूठे, कौन ले संज्ञान?
स्वरचित यथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई |