मोल!

शीर्षक : मोल!

पिंजरे में कैद 'मुषक' को देख मैंने राहत की साँस ली। कई दिनों से इस मुषक परिवार ने मेरे घर की चुलें हिला दी थी और घर की शान्ति की ऐसी-तैसी कर दी थी।। मुषक बच्चों के माता-पिता बेफिक्र हो विचरण कर रहे थे और अपने जीत का आनन्द मना रहे थे। घर का कोई कोना उनके अस्तिव के निशानों से वंचित नहीं था। जरासा अँधेरा हुआ नहीं कि शैतानों की उछल-कूद शुरू! कभी फ्रिज के नीचे छुप कर एकांत का आनन्द लेते तो कभी एक-दूजे के पीछे भागते-भागते थक कर वाशिंग मशीन के तले बनाएं आशियाने में एक-दूजे की बाहों में बाहे डाले सुस्ताते। 

कई दिनों तक तो मैं इस भ्रम में जी रही थी कि ये जोड़ी ड्रेनेज़ की पाईप लाइन से घर में दाखिल होती होगी और इसी गलतफहमी में जब मैं संध्याकाल में ही खिड़कियों के शीशे खींच लेती थी तो यह मुषक का जोड़ा मुझे चिढ़ाते हुएं ऐसे निकलता मानों अभयारण्य में रास्ता पार करता शेर-शेरनी का जोड़ा! मैं ठगी की ठगी रह जाती और ये किसी प्लास्टिक के डिब्बे को कुतर कर या किसी नई-नवेली दुल्हन सी सेज पर सजी चद्दर को कुतर-कुतर कर अपने तीखे दांतों के निशान चद्दर पर छोड़ मुझे चेतावनी दे जाते, मानों कह रहें हों, " हमें छेड़ोगी तो अन्जाम भुगताने के लिए तैयार रहना"।

यह कैसी विडम्बना थी कि मैं अपने ही घर में दुबक कर बैठी थी और चूहों का जोड़ा बिनधास्त अपने सृजन अभियान में लगा हुआ था। 

घर के सभी सदस्यों के सामने मैंने अपनी व्यथा को कथा बना कर दर्द भरे स्वर में सुनाई। किसीने चूहा मारो अभियान की पैरवी की तो किसी ने आटे में दवा मिला कर बनाई गोलियों को रामबाण उपाय बताया तो किसी ने नएं 'चिपको अभियान' का आगज़ करने की सलाह दी तो किसी ने जीवदया की पैरवी करते हुएं उनकी तड़प-तड़प कर होने वाली मौत के प्रति चिंता और समस्त जीवों के प्रति अपनी करुणा का प्रदर्शन किया।
मैं भी नहीं चाहती थी कि पर्युषण पर्व, गणेशोत्सव के इन पावन दिनों में 'मुषक हत्या' के पाप की भागीदार बनूँ। मैं दिनोंदिन संभ्रम के भंवर में गोते लगा कर थक चुकी थी तभी मेरी छोटी भाभी तथा बहन ने मिलकर एक सुझाव दिया, " क्यों न दीदी आप इस चूहे के पिंजरे का उपयोग करती?" 

पिंजरे का आकार-प्रकार देखकर मुझे विश्वास तो कम ही था कि इसका कुछ सकारात्मक नतीजा निकलेगा लेकिन कोशिश करने में क्या हर्ज है?
पास के घर से गीत के बोल सुनाई दे रहे थे, " हम होंगे कामयाब... हम होंगे कामयाब एक दिन... मन में है विश्वास...हम होंगे कामयाब एक दिन। " मेरी हिम्मत को जिन्दा रखने के लिए यह बोल काफ़ी थे।

पिंजरा लाकर रख तो दिया लेकिन उसका इस्तेमाल करने में आलस आड़े आ रहा था। रोज के रोज रसोई से सारी चीजें हटाकर फ्रीज में रखना रोजमर्रा का काम  हो गया था। 
पर्युषण, गणेशोत्सव की इतिश्री हो चुकी थी।
ऐसे ही एक दिन थकावट के कारण मैं फलों को फ्रीज़ में रखना भूल गई। रात को पानी लेने उठी तो देखा कि फल की टोकरी में पड़ा बड़ा सा सेब चूहे ने कुतर दिया था और अधमरा केला आधा अपनी दुर्दशा पर रो रहा था।

अब मेरी सहनशीलता भी खत्म हो चुकी थी। मैंने उन्हीं फलों को पिंजरे में लटकाया और उसे चूहें के 'राजमार्ग' पर स्थापित कर दिया। अब तक बड़े दोनों चूहें तो पड़ोसियों की दवा की गोलियों के शिकार बन गएं थे लेकिन पीछे अपनी औलाद छोड़ गएं थे। नादान बच्चें भी अब उन्हीं के नक़्शे-कदम पर चल रहे थे।

मन में एक विश्वास था कि अगर इंसान लोभ, मोह, कषाय के दलदल में फंस सकता है तो ये तो चूहें हैं! जरूर आएंगे मीठे सेब और केले के चक्कर में वापस मुँह मारने!"

मन में चूहों को कोसते-कोसते कब आँख लगी, पता ही नहीं चला। साड़ेचार बजे का अलार्म बजने लगा और उसके साथ कुछ खड़-खड़ सुनाई देने लगी। तभी मन में आया, कहीं चूहा तो नहीं फंस गया पिंजरे में! 

मोह-माया, वासना- क्रोध, ईर्ष्या-द्वेष के जाल से इन्सान नहीं बच सकता तो यह तो छोटा जीव है, कैसे बचेगा?

मेरा अंदाजा सही था। लोभ के पिंजरे में बन्द था चूहा। आजाद होने के लिए हाथ-पैर मार रहा था चहुँऒर लेकिन वह शायद अपने बुजुर्ग माता-पिता की सीख को अनदेखा कर अभिमन्यु सा तृष्णा के चक्रव्यूह में फंस चूका था। लोभ के चक्रव्यूह में प्रवेश करने का मार्ग तो वह जानता था लेकिन चक्रव्यूह से बाहर निकलने का ज्ञान शायद वह नहीं पा सका था। मुषक विघ्नहर्ता का वाहन जरूर था लेकिन स्वयं की आजादी का मोल तो उसे ही चुकाना होगा न...

स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।
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