शीर्षक : शहीद की सुहागन !
रंग दो ननदी मेरी सुनी-सुनी हथेलियाँ!
मेहंदी से लिख दो प्रीत की पहेलियाँ!
टेसू के फूलों से रंग दो मेरी चुनरियाँ,
फूलों की पंखुड़ियों से सज़ा दो गलियाँ!
हल्दी-उबटन से, महका दो मेरा अंग-अंग!
माँ भारती के लाल की प्रीत से रंग दो चुन्दड!
पहना दो माँ! अमर सुहागन का चुड़ा!
आशीष के कवच-कुण्डल, सुहागन का जोड़ा!
अक्षत उछालो पिताजी, कर दो कन्यादान,
अस्त्र-शस्त्र श्रृंगार, सीमा-रक्षा-हित प्रयाण!
तव बेटे के बलिदान का करूँ मैं सम्मान!
झुकने न दूँ तिरंगा! आबाद रखूँ आन-बान!
रणबांकुरे की भार्या, माथे रक्तिम टिका,
दुश्मन के लहूँ से, सजाऊँगी चाँद-तारे, बोर-टिका!
अमर शहीद की सुहागन, लिखूँगी शौर्य गाथा,
ऊँचा रहे सदा तिरंगा, उन्नत रहे सदा माथा!
स्वरचित तथा मौलिक,
द्वारा कुसुम अशोक सुराणा|