शीर्षक : ज़िन्दगी!
ज़िन्दगी तेरे ईश्क में, दीवाने हुएँ....
भूल जमाने का दस्तूर परवाने हुएँ!
दर-दर भटकते रहे बेगाने से यारों,
ठोकरें खा जमाने की, सयाने हुएँ!
रिश्तों के भँवर में ऐसे उलझ गएँ,
घर के रहे न घाट के, अजनबी हुएँ!
वक़्त की दहलीज पर फ़क़ीर से खड़े,
खुद की खोज में खुद से बिछड गएँ!
उम्र के ढ़लान से क़ाफ़िले गुजर गएँ ..
ज़िन्दगी तेरे लिए छुप-छुप अश्क़ बहाएँ!
साया भी साथ छोड़ चूका था जब यारों
यादों ने वादा निभाया हाथों में जाम लिएँ!
खामोश निगाहों ने पढ़ लिया खुद चेहरा,
आईना सिर बाँध खड़ा है फूलों का सेहरा!
ज़िन्दगी के साथ जब पढ़ा निकाह-नामा,
वो देती रही ज़ख्म तीर-तलवार से गहरा!
मुद्दतों बाद हमने ज़िन्दगी की ली बलैयाँ,
रातें हुई रंगीन, बिखरी सेज पर कलियाँ,
टूटे कंचुकी के बंध, गुलाबी अधर-पाश,
समर्पण-अधीर नदी ढूंढे सागर-गहराईयां!
द्वारा कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई, महाराष्ट्र,