घने अंधेरों में छू-मंतर हुए जो रिश्ते अजीबोगरीब से,दिल ही तो है, जानता दुनियादारी बहुत करीब से!
कृष्ण पक्ष का चाँद शर्मिंदा नहीं अपनी गुस्ताखियों पे...
फ़ितरत हैं साये की कालिख पोतने की उजालों पे!
किस तरह तोड़ा दिल सायों ने वक़्त की बेमानी में,
अनसुनी कर बुजुर्गों की बातें, चल पडे जवानी में!
पथरीली राह पर खुद ठोकर खाएं बिना चलने में,
दूजा कान बिंधे बिना अक्ल आती नहीं ज़माने में?
दिल जिद्दी बड़ा थमती नहीं दिमाग़ से जंग?
बहता जाता मृत शरीर सा नदी के प्रवाह संग!
वक़्त लेता मोड़ बहती नदिया की चंचल धार सा,
फेंक किनारे पर अनचाहे फूल-पत्ते-शव लहर सा!
दिल ही तो हैं चाहता उड़ान भर लूँ आकाश में!
कारे मेघों को दूँ सुनहरा तोहफ़ा ले बाहुपाश में !
बादलों की ठुठी पर लगा दूं काला तिल बार-बार,
खेत-खलियानों में आँसू लिए अन्नदाता करें इंतजार
दिल ही तो है खोएं न शोहरत की भूलभुलैया में!
कमजोर दिल नहीं कि बिखर जाएँ वक्त की आँधियों में!
हौसला देना दाता कि पीड़ित, शोषित के काम आऊं,
स्वाति नक्षत्र में पलकों में खरे मोती सृजित कर पाऊं!
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई |