अंतस का क्रन्दन... दशरथनन्दन, अंतस करे क्रन्दन,
क्षमाप्रार्थी मैं, लखन-रघुनन्दन!

सुवर्ण मृग देख मोह माही भटकी,
पलभर कंचन-कंचुकी में अटकी!

दशानन-साधुरूप में सुनी विनती!
लक्ष्मण-रेखा लाँघ कीनी गलती,

निर्मल, स्फटिक जल सी मैं पावन,
धरित्रि की जायी सुन्दर-मनभावन!

चंपा, चमेली से महक़ता आँगन,
ऋतु बसंत, खिला-खिला उपवन!

फंसी छल-कपट मायाजाल में कैसे?
'विनाश काले विपरीत बुद्धि' जैसे!

दु:साहसी रावण प्रताड़ित करें मोहे,
जानकी वल्लभ! वो जाने नहीं तोहे!

सियाराम! कब आओगे ले जाने मोहे राम?
कमलदल पर रोज लिखूं तुम्हारा ही नाम!

चंपा, चमेली, जूही, बेला, रातरानी मुरझाई,
अशोक वाटिका में मानों कालिमा है छाई!

आँखों के सूखे आँसू, ओस से भीगी भोर,
वाट जोहे अखियाँ कब वर्षा होगी..मोर!

विरह-अगन में काष्ठ सम जले मम तन-मन,
विश्वास-डोर थाम लो कौशल्यासुत रघुनन्दन!

'क्षमा वीरस्य भूषणम' क्षत्रिय कुल सिरमौर,
जाणो मन की पीड़ रघुनन्दन, दो मोहे ठौर !

स्वरचित तथा मौलिक,
द्वारा कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई, महाराष्ट्र |









 
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