ये प्यार ही तो ज़िन्दगी! भाग ५८
भाग ५८

वैदेही को फरवरी प्रथम सप्ताह में ही 'वज्र एक्सपोर्ट हाउस' से जुड़ना था। अभी तक कोई तैयारी नहीं हुई थी न उसकी न विभा की। विभा को मैच के लिए अच्छे जूते और सफेद स्कर्ट कम पैंट खरीदना था टूर्नामेंट के लिए और वैदेही को आधुनिक लेकिन सुविधाजनक 100% कॉटन के कपडे पसंद थे! उसने एक दो टॉप्स और जींस लेने का मन बना लिया था और एक टाइटन की सुन्दर सी घड़ी! 

विभा और वैदेही ने खरेदी करने का प्लान बना दिया था प्रश्न सिर्फ यह था की दादर की तरफ जाएं, चर्चगेट की तरफ या फिर खार लिंक रोड की ऒर! ओ जानती थी कि वहाँ रास्ते पर फेरीवालों के पास नए-नए डिझाइन के परिधान मिलते हैं वो भी सस्ते दाम पर लेकिन आप में मोल-भाव करने का हुनर होना जरुरी हैं! 'सस्ते में शिवपुरी जात्रा' करने के लिए ये सब सही ठिकाने थे यंगस्टर्स के लिए! 

युवा दिलों को सुकून पहुँचाते वस्त्र... इनसे अपेक्षाएं भी युवा मानसिकता सी! चार दिन पहना, फेंक दिया! ज्यादा उम्मीदें नहीं, न ही अपेक्षाएं! चार दिन की ज़िन्दगी...कल हम कहाँ, तुम कहाँ! आज मजे ले लो ज़िन्दगी का!। एक-दो बार पहन लिया,पैसा वसूल! फिर बाय-बाय!

विभा और वैदेही ने खार लिंक रोड की तरफ जाने का मन बना लिया था। दोनों 'ओला' कर निकल पड़ी खार लिंक रोड की तरफ! वहाँ ज्यादातर आधुनिक फैशन के परिधान    
अच्छे मिलते थे। जींस, टि-शर्टस, ट्रॉउज़र्स की अच्छी-खासी वैरायटी उपलब्ध थी! इसी विविधता की वजह से युवाओं में इन स्ट्रीट वेंडर्स का आकर्षण था इन नवीनतम फैशन के वस्त्रों के लिए! विभा और वैदेही भी अपने लिए  कपडे देखने लगी। कहीं भाव ज्यादा लग रहा था तो कहीं डिज़ाइनर कपडे पसंद नहीं आ रहे थे। कहीं रंगों का तालमेल मनपसंद नहीं था तो कहीं कपड़ा बहुत ही नाजुक था। वैसे तो आजकल युवाओं में खादी, सूती कपडों का आकर्षण अच्छा-खासा था और इसी वजह से उनकी कीमतें भी ऊँची थी! 
युवा मन अब परिधानों को सिर्फ तन ढकने का साधन नहीं बल्कि फैशन का कलात्मक दालन समझता था जहाँ वह अपनी पसंद, सोच और कलात्मक सृजन को अवसर दे सकें, अपने व्यक्तित्व को निखार सकें।

विभा ने ज्यादातर टि-शर्टस और जींस ख़रीदे! अब उसे 'शॉर्ट इन स्कर्ट पैटर्न' में और वह भी सफेद रंग में चाहिए थी जो उसे किसी विशेष तैयार वस्त्र की दुकान में ही मिल सकती थी या फिर किसी विशेष स्पोर्ट्स-सामान के आधुनिक शो रूम में! 

अब तक वैदेही ने भी दो टॉप्स, टि-शर्ट और दो जींस खरीद ली थी। जींस में उसे अपनी पसंद का आसमानी रंग मिल गया था इसलिए वह बहुत खुश थी। वैसे विभा को झंकी-पेंकी, चटक रंग पसंद थे। उसने टॉप रंग-बिरंगी लिए थे  और जींस टॉप के हिसाब से एक गहरा और एक हल्के नीले रंग की ली थी। वैदेही को शालीन, आँखों को सुकून देनेवाले हल्के रंग पसंद थे। जैसी दोनों की रंगों की पसंद अलग थी वैसा ही मिलता-जुलता दोनों का स्वभाव भी था। एक शांत झील की निशब्द सतह सी तो दूसरी कलकल करते झरने सी स्वच्छन्द, चंचल! एक बोलने में उबड़-खाबड़ धरातल सी तो दूसरी कोमल नव- पल्लव सी!

एक शो रूम को देख कर दोनों रुक गई। विभा ने शो केस में लगे कुछ ट्रैक सुट्स वगैरा देखे तो वह समझ गई कि यह स्पोर्ट्स के सामान की बड़ी नामचीन दुकान हैं। विभा को लगा मानों वह सही जगह पर आ गई हैं। विभा ने वैदेही को कहा, " चलो! यहाँ देखते हैं..'शॉर्ट कम स्कर्ट' यहीं मिलेगा शायद! लगता हैं यहीं सही जगह हैं भले ही शो रूम के तामझाम के हिसाब से चीजों की कीमते जरूर थोड़ी ऊँची होगी "

दोनों कांच का दरवाजा खोल अंदर चली गई! अब तक धूप से बेहाल इन युवतियों को वातानुकूलित शोरूम में  कुछ राहत महसूस हुई! जनवरी महीना संपन्न होने को था और सूरज ने अभी से ही अपना जलवा दिखाना शुरू कर दिया था! समय का संज्ञान लेते हुये दुकानदार ने सबको चाय-पानी के लिए पूछा और ठन्डे जल की बोतलें सामने रख दी। शुरूआती आदर-सत्कार के बाद वह अपने व्यापार की ऒर मुड़ गया और विभा की फरमाइश के हिसाब से सेवाएं देने लगा! विभा ने जैसे ही उन्हें स्कर्ट- शॉट के बारे में पूछा तो उन्होंने दो अलग-अलग तरीके से बनायें हुए स्कर्ट-शॉट सामने रख दिए। विभा को दोनों ही  बहुत पसंद आएं और वह दुविधा में फंस गई थी कि कौनसा स्कर्ट ले और उसने वैदेही के सामने देखा! वह समझ गई। उसने दोनों लेने का इशारा किया। वैसे तो यह विभा की रोज की आवश्यकता थी और कुछ विशेष रूप से खेल के सामान को समर्पित दुकानों में ही यह सुविधा उपलब्ध थी। विभा में दोनों पैक कराने का निर्णय लिया क्योंकि उसपर 'वैलेंटाइन डे स्पेशल ऑफर' भी था!  किसी न किसी बहाने कुछ फायदा मिल रहा हैं तो कौन उसे खोना चाहेगा? विभा बहुत खुश थी! खेल के मैदान में देखने वालों की नजरें सिर्फ खेल पर ही नहीं खिलाडी पर भी टीकी होती हैं यह वह जानती थी। बैडमिंटन के राष्ट्रीय खेल महोत्सव का देश-विदेश के महत्वपूर्ण चैनल्स पर सीधा प्रसारण होगा यह विभा जानती थी। इसीलिए उसने दोनों स्कर्ट्स पैक करने के लिए कहा था!
विभा और वैदेही ने कपडे की खरेदी तो कर ली थी अब जूते और घड़ी की बारी थी। विभा को सिर्फ स्पोर्ट्स शू खरीदने थे! उसी दुकान से विभा ने अपने लिए सफेद स्पोर्ट्स शू ख़रीदे। अब सिर्फ वैदेही के लिए कलाई की घड़ी खरीदनी बाकी थी। उन्होंने बांद्रा की टाइटन शो रूम का रुख किया। बड़ी शोरूम में नई-नई डिज़ाइन्स देखने को मिलेगी यहीं सोच कर वो दोनों बांद्रा के 'टाइटन शोरूम' की ऒर चल पड़ी थी। जैसा सोचा था वैसा ही सुन्दर नजारा था। सोने के मुल्लमे से लेकर  असली सोने की घड़ियाँ तो कहीं हीरे-माणिक -मोती से सजी अद्भुत कलाई की घड़ियों का कलेक्शन भी था। विभा और वैदेही वहाँ का माहौल देख कर विस्मित थी। उन्होंने विविध तरह की सभी घड़ियों को देख कर नयन-सुख लिया और अंत में वैदेही ने 'टाइटन रागा' की सुन्दर घड़ी पसंद की। विभा को भी वहीं घड़ी अच्छी लगी थी। कीमत भी उनके पहुँच में थी। वैदेही ने घड़ी का फोटो लेकर माँ और वज्र को भेजा। दोनों को भी उनकी पसंद बहुत अच्छी लगी! विभा और वैदेही ने बिल बनाने को कहा। यहाँ भी उन्हें 'वैलेंटाइन डे स्पेशल' की विशेष छूट का लाभ मिला! दोनों बहुत खुश थी! 

जैसा मन में सोचा वैसा ही जब इन्सान पा जाता हैं तो मन-मयूर झूम-झूम कर नाच उठता हैं! विभा और वैदेही के चेहरे पर असीम आनन्द की आभा झलक रही थी। जीवन के उबड़-खाबड़ रास्तों को पार कर अब जीवन- सरिता ने शांत-सुकून भरे धरातल को छूँ लिया था!

स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।
अगला भाग अगले अंक में....


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