GET IT ONGoogle PlayDownload ONApp StoreSign Up!Loginmodifyरिश्तें नफरत की यह आँधी, लील गई सब रिश्तों को।अपनापन स्नेहिल बिसराया, बांटा नेह परायों को।नहीं आपसी भाईचारा, प्रेमिल सी निर्मल धारा~मानव मन धर्म भ्रष्ट स्वार्थी, भूलाया अपनी संस्कृति को।चंचल जैनLabelDirected by पढ़ने के लिए लॉगिन/रजिस्टर करेंपढ़े द्वारा चंचल जैनThe Critic’s Cornerइस पर लोग क्या कह रहे हैं टिप्पणी लिखें