GET IT ONGoogle PlayDownload ONApp StoreSign Up!Loginmodifyप्रपोज...क्यों वक़्त-बेवक़्त चले आते हो?दिल के द्वार पर देते हो दस्तक?चुरा लेते हो नींदे अक्सर,पीछे छोड़ते हो यादों का बवंडर!क्या बनोगे मेरे दिल की धड़कन? सजाओंगे मेरे ख़्वाबों का उपवन?क्या आँखों में होगी तेरी...LabelDirected by पढ़ने के लिए लॉगिन/रजिस्टर करेंपढ़े द्वारा कुसुम सुराणाThe Critic’s Cornerइस पर लोग क्या कह रहे हैं टिप्पणी लिखें