कलाधर घनाक्षरी
नमन माँ शारदेकलाधर घनाक्षरीदंभ द्वेष अग्नि तेज, ज्वाल स्वार्थ सोच हेज, दुष्ट भाव से विनाश, भ्रांत बुद्धि मानिए।।गाँव देश हो विशेष, वृक्ष ठाँव हो अशेष,गीत ताल नेह डोर, छाँव शीत पाइए।।नाथ थाम हाथ नित्य,...
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