GET IT ONGoogle PlayDownload ONApp StoreSign Up!Loginmodifyकलाधर घनाक्षरीनमन माँ शारदेकलाधर घनाक्षरीदंभ द्वेष अग्नि तेज, ज्वाल स्वार्थ सोच हेज, दुष्ट भाव से विनाश, भ्रांत बुद्धि मानिए।।गाँव देश हो विशेष, वृक्ष ठाँव हो अशेष,गीत ताल नेह डोर, छाँव शीत पाइए।।नाथ थाम हाथ नित्य,...LabelDirected by पढ़ने के लिए लॉगिन/रजिस्टर करेंपढ़े द्वारा चंचल जैनThe Critic’s Cornerइस पर लोग क्या कह रहे हैं टिप्पणी लिखें