GET IT ONGoogle PlayDownload ONApp StoreSign Up!Loginmodifyमनहरण घनाक्षरी... पानी पानी!पानी-पानी हुई नारी,देख संवेदनाहीन,पुरुष मानस भारी।क्या स्वतंत्रता यहीं?पानी -पानी पुकारती,पीड़िता कराह रही,तड़पती राह पर।क्या आत्मा जिन्दा रहीं?पानी-पानी खेत सारे,कभी बून्द तरसाएकभी सूखे कभी ओले,क्या आत...LabelDirected by पढ़ने के लिए लॉगिन/रजिस्टर करेंपढ़े द्वारा कुसुम सुराणाThe Critic’s Cornerइस पर लोग क्या कह रहे हैं टिप्पणी लिखें