GET IT ONGoogle PlayDownload ONApp StoreSign Up!Loginmodifyकल के साये में आजकल और कल में ही उलझे रहे हम,जो कल आया ही नहीं…और जो कल बीत गया,उसे हम भूल गए कहीं।डर है बस इतना —कि इन कल की उलझनों में,कहीं ये आज…हमें ही ना भुला दे।कल के इंतज़ार में,और बीते कल के भा...LabelDirected by पढ़ने के लिए लॉगिन/रजिस्टर करेंपढ़े द्वारा Diya JaisinghaniThe Critic’s Cornerइस पर लोग क्या कह रहे हैं टिप्पणी लिखें