GET IT ONGoogle PlayDownload ONApp StoreSign Up!Loginmodifyसूर घनाक्षरी छंदसूर घनाक्षरी छंदशीत ऋतु चली आई,कलियाँ ले अंगडाई,मनहर मनोरम,सृष्टि हरषाई।।बलखाती मनचली,ओढ चली अलबेली,चुनरिया सतरंगी,धरा इतराई।।थर थर कांपे गात,धुप लगती सौगात,शाॅल, स्वेटर, रजाई, ठंडी गरमाई।।मूली प...LabelDirected by पढ़ने के लिए लॉगिन/रजिस्टर करेंपढ़े द्वारा चंचल जैनThe Critic’s Cornerइस पर लोग क्या कह रहे हैं टिप्पणी लिखें