बसंत!
खेत-खलिहानों में लहरायें थान ,पवन छेड रही वीणा पर मधुर तान!बिछी है धरा पें गेरूआ कालीन,कहकहें लगायें धरती फेंक वस्त्र मलीन!बहारों ने दी हौले हौले दस्तक,सूरजमुखी उठायें सूरज की ओर  मस्तक!प्रकृति ह...
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