GET IT ONGoogle PlayDownload ONApp StoreSign Up!Loginmodifyअरे मूढ़मति अरे मुढ़मति, बुद्धि की गागर भर।जीवन को स्थितप्रज्ञ रत्नाकर कर।।सुख-दुख जीवन-नैया के दो चप्पू।कर्म यज्ञ रख जारी, मत बन रे गप्पू।।मनुज जन्म दुर्लभ मनु कर भव पार।चुनौतियों से हौसला कभी मत हार।।अरे म...LabelDirected by पढ़ने के लिए लॉगिन/रजिस्टर करेंपढ़े द्वारा कुसुम सुराणाThe Critic’s Cornerइस पर लोग क्या कह रहे हैं टिप्पणी लिखें