सावन का मज़ा...
पगलाई घटाएँ बरस रही थी और माँ थी कि रट लगाएं बैठी थी, 'बेटा! छतरी लेकर जाना.. स्कूल'...अब माँ को कौन समझाएं? पहली बारीश में वो मिट्टी की सौंन्धी-सौंन्धी खुशबू, बूँद-बूँद से तन-मन को रोमांचित करती फुहा...
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