GET IT ONGoogle PlayDownload ONApp StoreSign Up!Loginmodifyउम्मीद!शिक्षा-दीक्षा, सेवा-चिकित्सा,जुड़ जाएं सिक्कों की लिप्सा।सेवा बने स्वार्थ-पूर्ति साधन।दर-दर ठोकरें खाता निर्धन।।बैसाखी आरक्षण की थाम कर,जाति आरक्षित कोटे के दम पर,मतिमंद जब बन जाएं डॉक्टर!मेरिट वाले कत...LabelDirected by पढ़ने के लिए लॉगिन/रजिस्टर करेंपढ़े द्वारा कुसुम सुराणाThe Critic’s Cornerइस पर लोग क्या कह रहे हैं टिप्पणी लिखें