नवल आस
झरझर झरती पात, ग्रीष्म ऋतु की मनमानी।नवल सृजन की आस, सृष्टि की रास सुहानी।।पतझड़ खिलते फूल, सुरभि का साज तराना~प्रकृति करे उपकार, भावना हो नित दानी।।चंचल जैन
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