GET IT ONGoogle PlayDownload ONApp StoreSign Up!Loginmodifyयादों का बवंडर.यादों के बवंडर से निकल गए होते...गर खुशबु तेरी फ़िजा में घुली होती!मौजों के थपेडों को निगल गए होते...आबरू वफ़ा की साँसों में घुली होती!क्यों डोलती रही वक़्त के झूलों पर?आफ़ताब रोशनी में नहा गया होता!जहाँ ...LabelDirected by पढ़ने के लिए लॉगिन/रजिस्टर करेंपढ़े द्वारा कुसुम सुराणाThe Critic’s Cornerइस पर लोग क्या कह रहे हैं टिप्पणी लिखें