GET IT ONGoogle PlayDownload ONApp StoreSign Up!Loginmodifyजहर घुला शहद...ये कैसा फलक?ये कैसा मंज़र?इंसानियत बिलख रही,मानवता कराह रही!मय्यत का सामान,प्रकृति सजा रही!!ये कैसी तरक्की,ये कैसी फतह?लाशों के अंबार पर,राजनीति फुदक रही!सत्ता के गलियारों में,असर्फिया बंट रही!ये कैसी...LabelDirected by पढ़ने के लिए लॉगिन/रजिस्टर करेंपढ़े द्वारा कुसुम सुराणाThe Critic’s Cornerइस पर लोग क्या कह रहे हैं टिप्पणी लिखें