जहर घुला शहद...
ये कैसा फलक?ये कैसा मंज़र?इंसानियत बिलख रही,मानवता कराह रही!मय्यत का सामान,प्रकृति सजा रही!!ये कैसी तरक्की,ये कैसी फतह?लाशों के अंबार पर,राजनीति फुदक रही!सत्ता के गलियारों में,असर्फिया बंट रही!ये कैसी...
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