GET IT ONGoogle PlayDownload ONApp StoreSign Up!Loginmodifyउलझन...उलझी-उलझी ज़िन्दगी में ,सवालों के कोलाहल में!कभी कान्हा की बांसुरी में,कभी शिव-तांडव में!वीणा के तार छेड़ती उंगलियाँ,खुशनुमा बयार में थिरकती कलियाँ!जलतरंग के सुर-ताल पर,राग-रागिणी गुनगुनाती कोयलियाँ!जीव...LabelDirected by पढ़ने के लिए लॉगिन/रजिस्टर करेंपढ़े द्वारा कुसुम सुराणाThe Critic’s Cornerइस पर लोग क्या कह रहे हैं टिप्पणी लिखें