फिर नयी पुकार...
कैसी है कश्ती और कैसे है किनारेन हम है तुम्हारे, न तुम हो हमारे,चाहत जो की थी वो गुमशुम है कब सेलगता है मोहब्बत की ही न हो तुमसे..देखे जो सपने, संजोके जो अपनेहकीकत में वो तो थे ही न अपने,जो समय ने दिय...
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