कब तक....
शीर्षक: कब तक..... कब तक मन का दर्द मन में छुपाते? पलकों की देहरी पर आँसू रोक पाते? छलकता जाम पराई नज़रों से बचाते? सुलगता ज्वालामुखी थपकियाँ दे सुलाते? भीगे नयनों की भीगी कोरों को सुखाते...
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