ये प्यार ही तो ज़िन्दगी.... भाग ७७
ये प्यार ही तो ज़िन्दगी.... भाग ७७
भाग ७७

आबा के सासवड जाने के बाद वैदेही की जिम्मेदारी और भी बढ़ गई थी। भले ही वह तीन दिन घर से काम करती थी लेकिन 'वज्र एक्सपोर्ट हाउस' का कामकाज देश-विदेश में फैला हुआ था। सभी मूल्यवान ग्राहकों कों सही तरह से सेवाएं देना, उनकी शंकाओं को दूर करना, उनके आर्डर स्वीकार कर उन्हें सही समय पर माल पहुँचाना आसान काम नहीं था! अब तक आबा इस काम को देखते थे लेकिन अब उनका ज्यादातर समय पुणे ऑफिस में जाता था। वज्र यहाँ का कामकाज बहुत ही अच्छी तरह से संभाल रहा था लेकिन सभी विभागों के बिच तालमेल बनाना और सँभालना वैदेही का काम था।

परीक्षा की भी तैयारी करनी थी। यह अलग बात थी कि 'वज्र एक्सपोर्ट हाउस' का कामकाज उसे किताबी ज्ञान को व्यवहार में अपनाने का बहुमूल्य मौका दे रहा था। वज्र से उसका काम के बहाने बार-बार मिलना हो रहा था। वह चाहती थी कि घर और ऑफिस के काम को अलग-अलग ही रक्खा जाय लेकिन वज्र था कि ऑफिस में भी अपनी बचपन की दोस्ती को भूल कर वैदेही से अलग, अपने प्रतिष्ठान की कर्मचारी सा बर्ताव नहीं कर पाता था। उसके लिए वैदेही उसकी बचपन की करीबी दोस्त थी, हैं और रहेगी यही शाश्वत सत्य था। वैदेही सदा कश्मकश में ही रहती। धरा-गगन के मिलन की धुंधली सी क्षितिज रेखा वह कभी ढूंढ़ ही नहीं पाती।

वज्र और वैदेही हौले-हौले एक-दूसरे के करीब आने लगे थे। दोनों एक-दूसरे से मिले बिना रह नहीं सकते थे। वैदेही एक बार सब्र कर लेती मगर वज्र अधीर हो जाता। फिर उसके फ़ोन पर फ़ोन आने शुरु हो जाते। ये क्या रिश्ता था, दोनों समझ ही नहीं पा रहे थे और जाने-अनजाने में प्रवाह के साथ आगे-आगे बढ़ते ही जा रहे थे।

वज्र की आजी लक्ष्मीबाई जब से आई थी दो-तीन बार तो जानकी जी को याद कर चुकी थी। आज वज्र ने फ़ोन कर जानकी जी और वैदेही को खाने पे बुला ही लिया था । दोनों ने शाम के भोजन के लिए आने की स्वीकृति दी तब जाकर कहीं लक्ष्मीबाई के दिल को सुकून मिला। आखिर वज्र, वैदेही उन्ही के आँचल तले प्यार की नमी पा कर बड़े हुए थे। आजी के आँखों में अब तक उस गोरी-चिट्टी बच्ची की तस्वीर छुपी हुई थी और जानकी जी का तो क्या कहने! श्री और उनका प्यार उन्हीं के घर के आँगन में परवान चढ़ा था।

आजी वाचाल थी शायद इसीलिए उनका दिल स्फटिक सा निर्मल और पाक-साफ़ था। लक्ष्मीबाई  के दिल के आईने पर न कभी स्वार्थ की झीणी परत जमी थी न कभी चेष्टा-चुगली-इर्ष्या-घृणा की धूल चढ़ी थी। आजी जो कुछ कहना था, साफ़-साफ़, सीधे-सीधे मुँह पर कह देती थी बिना अगले की प्रतिक्रिया की पर्वा किए बगैर । एक बार तो आजी का यह रवैया रुखा, असहनीय लगता लेकिन अगले ही पल वह व्यक्ति सोचने लगता, "अरे अच्छा ही हुआ! दादी जी ने मुँह पर ही कह दिया! सच को कहने के लिए ही तो आजकल हिम्मत चाहिए! यह न कहती दादी तो उसे क्या फर्क पड़ता? यह तो मेरे सुधार के लिए जरुरी हैं। उनकी खरी-खोटी सुनकर मैं खुद में सुधार करूँ यहीं चाहती हैं वो!"

आजी की यहीं बात कभी अगले को पशोपेश में डाल देती तो कभी 'खुल जा सिम सिम' के मन्त्र की तरह दिल के बन्द गुफ़ा के किंवाड़ों को खोल देती।

वज्र कल्पना लोक में विचरण कर ही रहा था तभी विभा का फ़ोन आया। विभा और यश दोनों वज्र की आजी से मिलने आ रहे थे। दादी भी बहुत खुश थी की आज युवा मित्र-मंडली से मिलना होगा।

आजी को युवाओं से मिलना-जुलना, उनसे बातें करना, उनके बिच बैठ कर गप्पे लगाना बहुत सुहाता था। उनके साथ जब भी वह बतियाती, उनके अंदर का बच्चा जिन्दा होकर हुड़दंग मचाने लगता। 

आजी को देख कर लगता, इन्सान को अगर जीना हैं तो आजी की तरह ही जीना चाहिए... भविष्य की हर फ़िक्र को कहकहों में उड़ा कर, हर गिले-शिकवे को पीछे छोड़ कर सिर्फ वर्तमान में यादों की सुन्दर गठरी साथ लेकर, ज़िन्दगी के हर मोड़ पर थोड़ा ठहर कर, हर पल को मस्ती में जी कर, हर चुनौती का जीवट और जिद से सामना कर सिर्फ और सिर्फ लक्ष्य पर नजरें गड़ा कर आगे मंजिल की ऒर बेखौफ़ डग भरते-भरते! 

आजी ने अन्नपूर्णा को गर्म नाश्ता बनाने को कह दिया था। बच्चें आएं तो कुछ तो चाहिए न उनकी पसंद का! समोसा और पुदीने की चटनी! गर्म मसाले और पुदीने की खुशबू को क्या कोई छुपा सकता हैं भला? वज्र ने आते ही पहचान लिया कुछ खास बन रहा हैं रसोई में!

वह बाहर आ कर सोफे पर बैठा ही था कि दरवाज़े की घंटी बजी। वज्र जानता था, यह यश हैं क्योंकि बेल कैसे बज रही हैं इससे भी आने वाले का बिना देखे ही पता लग जाता हैं कई बार! इतना आत्मविश्वास और किसकी बेल में महसूस हो सकता था ?

विभा ने वज्र से कल ही फ़ोन पर बात कर ली थी और लाली से जुड़ी अब तक की सारी बातें उससे साँझा कर दी थी। आजी के समक्ष गलती से भी इस बात का जिक्र न हो इसका सबको ध्यान रखना जरुरी था। 

विभा के दिलोंदिमाग में ज्वालामुखी दहक रहा था। उसे शांत करने का, उससे ध्यान हटाने का एक ही रास्ता था मित्र-मण्डली से बातचीत! उसे परीक्षा की तैयारी भी करनी थी। एक अवरोध पार कर वह आगे बढ़ने लगती  तब तक दूसरी अडचन उसके आगे बाहें फैलाएं खड़ी नज़र आती... ज़िन्दगी मानों अवरोधों की स्पर्धा बन गई थी। 

आजी को देख यश ने उन्हें सीधी 'जादू की झप्पी' ही दे दी और पुछ बैठा," कैसी हो मेरी सदाफूली सी जवाँ आजी? और दोनों जोर-जोर से हँसने लगे! विभा ने उनके पैर छुएं! आजी ने सबको आशीर्वाद दिया और सबको अपने सामने सोफा पर बैठाया। कुछ ही दिन पहले सभी सासवड आ कर गएं थे। उन्हें दूर-दूर तक फैले अंगूर के बाग बहुत पसंद आएं थे। गाँव की उपजाऊ मिट्टी का ही कमाल था कि वहाँ मीलों दूर तक अंगूर के ही बाग नजर आ रहे थे। अंगूर भी बीजविहीन, लम्बे-लम्बे और एकदम मीठे-मीठे बिल्कुल आजी के जैसे सुन्दर, रसीले !

अगले हफ्ते यश को लखनऊ जाना था। द्वितीय चयन स्पर्धा का शुभारम्भ होने वाला था। इस बार उसके साथ नितीन सर नहीं थे बल्कि उसे अकेले ही जाना था। इंडियन एयरलाइन्स की टिकट बुक हो चुकी थी। यश का जाने का नाम लेते ही विभा को साँप सूंघ जाता था। कितना समझाया था उसे लेकिन वह संभल ही नहीं पा रही थी। थोड़ा संभल भी जाती तो कोई नई बला आकार दिमाग़ में घर कर जाती और सारे किएं-कराएं पर पानी फेर देती। 

वज्र ने आज उसे बढ़े भाई की तरह डांटते हुए कहाँ, " विभा! क्या हम तुम्हारे कुछ नहीं लगते? यश अगर आगे बढ़ रहा हैं तो उसे हँसते-हँसते विदा करना क्या हमारा फ़र्ज नहीं हैं? क्यों उसके पैरों की जंजीर बन रही हो? वह प्यार भी क्या काम का जो स्वच्छन्द परिंदे के पर कांट दे और उसका उम्मीदों का नीला आसमान उससे जबरन छीन लें?

विभा छोटे बच्चें सी रोने लगी। वज्र ने उसे दिल खोल कर रोने दिया। सच में वह रोज-रोज बिन बुलाये आती और आ कर गहरी खाई में धकेलती मुसीबतों की श्रृंखला से तंग आ गई थी। आजी से भी न रहा गया। वह किसी को भी रोते हुए नहीं देख सकती थी। उसने विभा के गालों पर चमकते आँसुंओं को पल्लू से पोंछा और उसे सीने से लगाते हुए कहा, " बेटा! उपर वाला भी उनकी ही परीक्षा लेता हैं जिन्हें वह मजबूत और शक्तिशाली बनाना चाहता हैं। तुम तो एक खिलाडिन हो। अंतिम क्षण तक लड़ने में माहिर! फिर आज यह कायरता क्यों? बेटा! अर्जुन को गीता सुनाते श्रीहरि का चित्र देखा कभी? क्या कभी पढ़ा हैं तुमने गीता का वह अध्याय जब अर्जुन हतबल हो कर शस्त्र नीचे रख देता हैं और कहता हैं कि अपनों के सामने श्रीहरि मैं कैसे शस्त्र उठाऊं? तब क्या कहाँ श्रीकृष्ण ने? "हे वीर! तेरा काम कर्तव्य का निर्वहन करना हैं। धर्म की रक्षा करना हैं.. हार कर, हतबल हो कर पीछे हटना तेरा धर्म नहीं!" 

अब तक विभा संभल चुकी थी।  चौथी कक्षा तक पढ़ी आजी भी अगर इतना समझ सकती हैं तो मैं साहित्य की विद्यार्थिनी क्यों नहीं? उसने स्वयं को कोसा और अन्नपूर्णा ने हाथ में दिये पानी के लोटे से पानी पिया...तब जा कर वह शांत हुई....

मन जब विषाद से भर जाता हैं तो आँसू मन के कलूष को धो देते हैं और मन को फिर से तरोंताजा करते हैं। विभा अब कुछ संभल चुकी थी। चुप रह कर मुक्कों की मार खा कर वह टूटने के कगार पर पहुँच गई थी लेकिन वज्र की सही समय पर दी गई औषधि की छोटी सी मात्रा ने उसे फिर से खड़ा कर दिया था, नए संकल्प और दृढ़ विश्वास के साथ!

स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।
अगसला भाग अगले अंक में...


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