ये प्यार ही तो ज़िन्दगी... भाग २८
ये प्यार ही तो ज़िन्दगी... भाग २८
भाग २८

विभा नींद में ही थी.. परिंदों की आवाज़ के साथ-साथ उसे दरवाज़े की घंटी सुनाई दी! पक्षियों की आवाज़ सुन उसे ऐसे लग रहा था मानों कोई भारतीय संगीत का जानकार भोर में रियाज कर रहा है...उसने अंगड़ाई ली और करवट बदल कर फिर सो गई...आज छुट्टी थी...इसीलिए उसने लाली को कल उसकी मौसी के यहाँ जाने की अनुमति दे दी थी..उसे कुछ रुपए देकर कुछ कपडे, जरुरी चीजें भी खरीदने के लिए कहा था और शाम तक वापस लौटने को भी चेताया था..
विभा को भी छुट्टी का आनन्द तो लेना ही था ...उसने मखमली रजाई मुँह पर खींच ली और सुकून से वह साँसे ले रही थी कि एक बार फिर से बेल सुनाई दी और वह उठ खड़ी हुई...रजाई पीछे की तरफ फेंक कर, बाल संवारते हुए, मन में आगंतुक को कोसते हुए उसने दरवाज़े की चेन लगा कर बाहर झाँक कर देखा... बाहर खड़े पिताजी को देख वह आश्चर्य चकित हो गई और उसने झट से दरवाजा खोला... "अप्पा! सॉरी हं.. सकाळी..सकाळी... फोन पण नाही केला? सुट्टी आहे न आज डॉ. आम्बेडकर जयंती ची..." बर झालं... ग पोरी...अप्पा बोल ही रहें थे और उसने 
अप्पा को नमस्कार किया और वह उनके हाथ से सामान लेने लगी...
"अप्पा! इतना लगेज? गरीबों को कुछ बाँटना है क्या? "
अप्पा जोर-जोर से मुस्कुराने लगे... "माझी पोर शोभतेस हं " कहकर वो आगे बढ़कर पलंग पर बैठ गए! सफेद गाँधी टोपी, सदरा (कुर्ता) और मलमल की धोती, आगे की जेब में पेन और सदरे की दाहिनी तरफ की जेब में मोबइल! आँखों पर कत्थई फ्रेम की ऐनक और चेहरे पर 'मिलियन डॉलर' मुस्कान!
विभा ने पानी का ग्लास हाथ में थमाया और गैस के चूल्हे पर चाय रख कर अप्पा के लिए खारे बिस्किट्स प्लेट में सजा कर उसने टी-पॉय पर रख दिएँ और दो मग में चाय ले कर वह बाहर चली आई!
पिता-पुत्री ने चाय-बिस्किट्स का लुत्फ़ उठाया और दोनों गाँव की बातों में व्यस्त हो गएँ! अस्पताल में मुलाक़ात हुई थी सबसे एक मरीज की तरह लेकिन अप्पा फिर नहीं मिले थे उसकी मित्र-मण्डली से क्योंकि वे विभा को लेकर दिल्ली चले गए थे उसके इलाज के लिए ! विभा ने जब कहा कि वो सब एक नुक्कड़ नाटक कर रहें है तो अप्पा बहुत आनंदित हुए! उन्होंने कहा,' बेटा विभा! आज इथेच बोलव ना सगळ्यानाचं! मला पण भेटतील सगळे " मैं भी उनका हालचाल पूछूंगा, उनसे खुल कर बात करूँगा तो मुझे बहुत अच्छा लगेगा! 
विभा को भी अप्पा की बात सही लगी..."पण अप्पा..
जेवणाचं काय? लाली सुद्धा बाहेर गेलेली आहे " अगं पोरी! जाऊ या की 'हॉटेल अदिति' मध्ये... "अप्पा.. पण वज्र ला..." उसका वाक्य पूरा होने से पहले ही अप्पा बोल पड़े.. "फ़िक्र मत कर बेटा!.. वो अण्णा शेट्टी दोस्त है मेरा! उसे कहता हूं मैं वज्र के लिए नारियल चटनी आणि पोंगल बनाने को..."
विभा खुश थी! वो अपने पिता की बहुत लाडली थी! वैसे भी वो पहली औलाद थी और अपने पिता पर गई थी...ज्यादातर उसके गुण उसके अप्पा से ही मिलते थे! विभा अप्पा के जैसी ही खुशमिजाज़, बिनधास्त और बेखौफ़ थी ! अपने क्षेत्र में ऐसे ही नहीं था दबदबा उनका! 'अच्छे के लिए अच्छे पर बुरे के लिए बुरे थे वह ' जीवन का यहीं फंडा था उनका! 
अखाड़े में मेहनत कर यह शरीर-यष्ठी पाई थी उन्होंने! घर में उनकी एक आवाज़ गुंजती कि सारा घर सचेत हो जाता! घर में ही नहीं पुरे गाँव में धाक थी उनकी! सभी उन्हें 'शुगर किंग' ही कहते!
विभा ने सबसे पहले यश को फोन कर कहा क्योंकि उसे पता था वह जल्दी उठ कर तैयारी करने लगेगा!  तीनों को उसने 10 बजे तक आने को कहा ताकि आराम से बातें कर सकें और फिर लंच के लिए जा सकें!
अब अप्पा ने सारा 'खजाना' निकाल कर विभा को दे दिया! चकली, अनारस, चिरोटे, चिवडा, सूजी के लड्डू .. कुछ बाकी नहीं रक्खा था माँ ने..
"अप्पा! मी बकासूर आहे का? किती फराळ?" अग पोरी! तुझी आई ऐकते का?  उसने तो एक और डब्बा दिया था.. मित्र-मण्डली हैं न तेरी इतनी बड़ी.. कैसे ख़त्म होगा.. समझ में ही नहीं आएगा तुम्हें ! घर की चीज हैं न बेटा! अप्पा विभा को अक्सर बेटा कहते! उनका उम्मीदों का चिराग वहीं तो थी! ऊपरवाला भी कुछ न कुछ हाथ में रखता हैं ताकि हम उसे सदा याद करें.. वरना... उसका छोटा भाई, कृष्णा-कोयना के संगम में साँझ के अँधेरे में भंवर में फंस कर इस दुनिया को अलविदा क्यों कहता?
विभा पानी पीने के बहाने उठ कर रसोई की तरफ चली गई.. पानी पी कर उसने बेसिन के यहाँ जा कर जोर-जोर से मुँह पर पानी छिड़का और फिर अप्पा के पास आ कर बैठ गई! 
अप्पा ने एक लैपटॉप भी लाया था विभा के लिए... देखते ही वह बोल पड़ी, " अप्पा! कशाला एवढा खर्च करता 'डेस्कटॉप' आहे न! " लेकिन अप्पा को कौन रोकेगा? उन्होंने बेटी के हाथ में 'एपल' का लैपटॉप रक्खा और कहा, "बेटा! खूप शिक! अपने पैरोंपर जरूर खड़ी रहना बेटा.. लेकिन मेरा भी तो दिल करता हैं न कुछ तेरे लिए लाने को...कुछ प्यार से देने को!"  विभा ने अप्पा को 'जादू की झप्पी दी' और पलकों के बीच ठहरे आंसुओं को बहने दिया! सिवा उसकी मित्र-मण्डली, यहाँ और कौन था उसका? एक लाली थी तो वह काम में व्यस्त रहती और खाली समय पढ़ाई में! विभा उसे जैसे भी समय मिलता, कुछ किताबें लाकर देती और सिखाती! अब वह हिन्दी, मराठी लिखना-पढ़ना सीख गई थी और अंग्रेजी अभी-अभी सीखना शुरू किया था! छोटे-छोटे शब्द अब वह लिखने लगी थी.. लाली काम में जीतनी तेज थी उतनी ही पढ़ाई में भी तेज थी! विभा एक-दो बार समझाती और वह फटाफट समझ जाती! जैसे-जैसे वह सीख रही थी, विभा को एक आत्मिक सुख की अनुभूति हो रही थी! विद्या भी क्या चीज हैं, जीतना बाँटते हो, उतनी बढ़ती हैं मानों स्वच्छ कुएँ का स्फटिक सा निर्मल पानी ! विद्या ऐसा धन है जिसे न तो कोई चुरा सकता है न लूट सकता है.. ज़िन्दगी के उतार-चढ़ाव में,  धूप-छाँव में अक्सर काम आता है! मुम्बई में विभा के साथ रहकर लाली भी समझदार और होशियार बन गई थी... अप्पा ने उसके लिए भी दो ड्रेस, किताबें रखने के लिए बस्ता लाया था! विभा देख कर बहुत खुश हुई थी! वो जानती थी लाली फूले नहीं समाएगी यह देख! इसलिए नहीं कि अप्पा उसके लिए भी सब चीजें लाएं बल्कि इसलिए कि अप्पा उसे अपने परिवार का हिस्सा मानते हैं! 
विभा बार-बार घड़ी की तरफ देख कर सारा सामान समेट कर रखने की कोशिश कर रही थी! अप्पा पद्मावती जी से फ़ोन पर बात कर रहें थे! देर रात निकले थे वह कराड से... नींद भले ही ली थी उन्होंने गाड़ी में पर दो-दो घाटों को पार कर मुम्बई पहुंचना आसान तो था नहीं! वह अंदर के कमरे में आराम करने चले गए और विभा अपने मित्र- मण्डली के इंतज़ार में दीवार पर लगी घड़ी के काँटों की  टिक-टिक सुन ही रही थी कि डोर बेल बजी....

स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई |

अगला भाग अगले अंक में....
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