37554235542modify रिश्तें नफरत की यह आँधी, लील गई सब रिश्तों को।अपनापन स्नेहिल बिसराया, बांटा नेह परायों को।नहीं आपसी भाईचारा, प्रेमिल सी निर्मल धारा~मानव मन धर्म भ्रष्ट स्वार्थी, भूलाया अपनी संस्कृति को।चंचल जैनLabelDirected by द्वारा चंचल जैनShared03 Apr 2025Start03 Apr 2025End03 Apr 2030 The Critic’s Cornerइस पर लोग क्या कह रहे हैंटिप्पणी लिखेंPranal Jain03-May-2025CommentLikeबहुत ही दिल को छू लेने वालीPranal Jain13-May-2025CommentLikeअत्युत्तम सृजन Chavi Jain Dhabaria16-Aug-2025CommentLikeबधाई हो! Intranetuser Demo02-Nov-2025CommentLikeसुन्दर छवि, सुन्दर प्रस्तुति Sachin Jain17-Feb-2026CommentLikeवाह! ❤️❤️Tanu Jain18-Mar-2026CommentLikeबिल्कुल दिल को छू लेने वाली रचनाCreativeinfo Demo24-Apr-2026CommentLikeक्या खूब लगती है, बड़ी सुन्दर दिखती है ❤️❤️❤️❤️रिश्तें © टिप्पणी400 characters remainingजमा करेंरद्द करें