कालचक्र!
कालचक्र!

सहज नियति की  मंजूरी से ,

       ग्रह  गतिमान होते हैं ।

  कालचक्र कुदरत अधीन सभी,

      निश्चित कर्म पिरोते हैं ।।


कुछ न कुछ घटनाओं के पिछे, 

       कारण जरूर होते हैं ।

   करते रहो शुभ कर्म अपना ,

     फल पाते जो बोते हैं।।


  रहें सदा अलिप्त भावों में ,

    घटित घटना निहारोगे।

विचलित  होना  नहीं कभी भी 

   कभी न मन से हारोगे।।


  रखें  सदा मन को संतोषी 

   सुख सुकून यदि पाना है

  पाले  न अपेक्षाएं अनहद

     निष्ठा  हमें निभाना है ।।


स्वरचित: अशोक दोशी 

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