34575535755modify भाव झरनाभाव झरना रंगों का मेला मनभावन।प्रीत, स्नेह हो निर्मल, पावन।।मेल-जोल साथी नित रखना।जीवन धर्म भाव हो झरना।।स्वरचित मौलिक रचना चंचल जैनLabelDirected by द्वारा चंचल जैनShared16 Mar 2025Start16 Mar 2025End16 Mar 2030 The Critic’s Cornerइस पर लोग क्या कह रहे हैंटिप्पणी लिखेंकुसुम सुराणा18-Mar-2025CommentLikeबेहतरीन प्रस्तुति Admin Manager23-Mar-2025CommentLikeबहुत सुन्दर कविता लिखी है। मैं आपकी लेखनी की सराहना करता हूँ।Saanvi Jain07-May-2025CommentLikeबधाई हो! Hemant Jain08-May-2026CommentLikeबहुत बढियाँ भाव झरना© टिप्पणी400 characters remainingजमा करेंरद्द करें