ये प्यार ही तो ज़िन्दगी... भाग ८२
ये प्यार ही तो ज़िन्दगी... भाग ८२

भाग ८२

विभा और जानकी जी लाली के साथ समय पर डाक्टर के यहाँ पहूँच गई थी। जाते-जाते वैदेही को जानकी जी आजी के यहाँ छोड़ गई थी क्योंकि उन्हें कुछ ज्यादा वक़्त भी लग सकता था। वैदेही इकोनॉमिक्स की किताब भी साथ लेकर आई थी ताकि कुछ समय पढ़ाई कर सकें।
शाम का वक़्त! सभी कार्यालय, व्यापारिक संस्थान बन्द होने का समय होने के कारण रास्तों पर जबरदस्त ट्रैफ़िक था लेकिन राहत की बात यहीं थी कि सभी समय पर क्लिनिक में पहुँच गई ! डॉक्टर ने भी सात बजे लाली को ऑपरेशन थिएटर में ले लिया था। विभा और जानकी जी बाहर कुर्सियों पर बैठ गई। उन्हें पता था कि कम से कम आधा-पौना घंटा तो जरूर लगेगा।

अब तक डॉ. पदमा जी ने लाली को विश्वास में ले लिया था। उन्होंने उसे सिर्फ थोड़े से भाग में अनेस्थिया दिया था। पहले ही उसे सब कुछ बता कर मानसिक रूप से तैयार कर दिया था ताकि उसका सहयोग शस्त्रक्रिया के समय मिल सकें। शस्त्रक्रिया तो छोटी थी लेकिन बाद होने वाले रक्तस्त्राव को मर्यादित करना जरुरी था। दवाईयों की वजह से दर्द भी ज्यादा महसूस नहीं होगा ऐसा डॉक्टर पदमा जी ने उसे समझाया था।

अप्पा वहाँ पहुंचे तब तक शस्त्रक्रिया ख़त्म हो चुकी थी और डॉक्टर ने दो घण्टे में उसके उस भाग की संवेदनाएं पुनः आने की बात कही और सब कुछ सही तरीके से पार पड गया हैं ऐसा विश्वास भी दिलाया।

अप्पा और जानकी जी बातों में व्यस्त थे और विभा मुंशी प्रेमचंद की किताब पढ़ने के लिए पर्स से निकाल रही
थी तभी एक आत्महत्या की कोशिश का केस आ गया। अस्पताल में दौडा-दौड़ शुरु हो गई। सभी फुर्ती से अपना काम करने में लगे थे। डॉक्टर को उसी समय इमरजेंसी केस आया हैं कह कर घर से बुला लिया गया था।

एक नव-विवाहिता ने आत्महत्या की कोशिश की थी। ससुरालवाले ही उसे अस्पताल ले आएं थे। पुलिस केस था तो अस्पताल वालों ने पुलिस को भी सूचीत कर दिया था।
लड़की की माँ की आँखों से आँसू बरस रहे थे। पिता दौड़ भाग कर डॉक्टर की मिन्नतें कर रहा था और ससुराल वाले भी बहु के बचने की कामना कर रहे थे। पति का हाल बेहाल था। छ: महीने पहले ही दोनों ने प्रेम विवाह किया था। न कोई दहेज लिया था न कोई मान-मनुहार कराई थी और विशेष यहीं था कि दोनों परिवारों की रजामंदी से शादी हुई थी फिर ऐसा क्या हो गया कि बहु ने आत्महत्या की कोशिश की?

विभा, जानकी जी और अप्पा दुःखी मन से सब कुछ देख रहे थे। वो ईश्वर से यहीं प्रार्थना कर रहे थे कि हे प्रभु! इस नव-यौवना को बचा ले ! अभी तक तो इसने ज़िन्दगी को देखा ही कहाँ हैं? न जानें वो कौनसा मनहूस पल था जब इसने आत्महत्या की सोची। क्यों आज की पीढ़ी में सहन शक्ति की इतनी कमी हैं? क्यों जरा सी धूप में ही पिघल जाती हैं मोम सी यह पीढ़ी?

सवाल कई थे जवाब ढूंढने थे। तभी सिस्टर बाहर आई और उसने एक-एक को जा कर लाली को मिलने की अनुमति दी। सब से पहले अप्पा अंदर गए। लाली को होश में बात करते देख अप्पा के माथे की चिंता की लकीरों की जगह ख़ुशी की आभा ने ली। अप्पा जल्दी से जल्दी लाली को घर ले जाना चाहते थे। विभा की पुरानी यादें ताज़ा हो गई थी और सिर्फ याद से ही उसके मन में सिहरन दौड़ने लगी थी। जानकी जी ने कुछ समय विश्राम करने देने तथा डॉक्टर के कहे अनुसार काम करने की सलाह दी।

आधे घण्टे बाद डॉ पदमा जी आई और उन्होंने जानकी जी तथा अप्पा को केबिन में बुलाया। उन्होंने दवाईयाँ तथा खाने में क्या-क्या लेना हैं इसकी सविस्तर जानकारी वाला कागज़ आबा को दे कर लाली के डिस्चार्ज के पेपर तैयार करने के निर्देश दिए और पूरा बिल भी थमा दिया।

लाली का यह 'कारनामा' रूपए पच्चीस हज़ार का पानी कर चूका था लेकिन एक नाबालिग लड़की की ज़िन्दगी के आगे वो सिर्फ कागज़ के टुकड़े थे अप्पा के लिए। अप्पा ने डॉक्टर के पेपर को स्कैन कर विभा को भेज दिया था ताकि वह भी ध्यान रख सकें। अब अप्पा ने झटपट 'ओला' बुक की और सभी घर की ऒर निकल पड़े।

अप्पा नकारात्मक घटनाओं से सभी को दूर रखना चाहते थे। बहुत बार बार-बार घटने वाली ऐसी निराश करती घटनायें इन्सान को अवसाद में धकेल देती हैं यह यशवंत राव जानते थे। वह नहीं चाहते थे कि बच्चें फिर उस खाई में गिरे जिससे निकलने के लिए उन्हें एड़ी-चोटी का जोर लगाना पड़ा था।

अप्पा ने विभा को उसके और यश के चयन के बारे में पूछा। वह उनकी नई जोड़ीदार वीणा से भी मिलना चाहते थे। विभा किताब साथ में जरूर ले कर गई थी लेकिन वह एक भी पन्ना पलट नहीं पाई थी। अप्पा ने जानकी जी को धन्यवाद दिया और उन्हें घर तक पहुँचाया। वो वैदेही के लिए वज्र के घर के यहाँ उतरी। जानकी जी ने उन्हें लाली को अपने यहाँ रखने के लिए कहा लेकिन अप्पा ने सब कुछ सही तरीके से करने का आश्वाशन दिया और वो घर की ऒर निकल पड़े।

अब लाली कुछ-कुछ स्वाभाविकता की ऒर लौट चुकी थी। दवाईयों की वजह से उसे नींद भी आ रही थी। उसे डॉक्टर ने अभी कुछ भी खाने को मना किया था। वह किशोरी अब थक भी चुकी थी। उसे आज अप्पा ने बाहर के कमरे में ही सोने को कहा था। दवाईयाँ, सैनीटरी नेपकिनस और जरुरी चीजें अप्पा ने क्लिनिक के ही मेडिकल स्टोर से खरीद ली थी। रात की दवा दे कर अप्पा ने लाली को सुला दिया था।

साँझ की बेला में वैदेही ने आजी को दीया-बत्ती करने में मदद की। विघ्नहर्ता के आगे दीपक रख कर, अगरबत्ती जला कर आजी के साथ वज्र और वैदेही ने 'शुभम करोति' बोली और आजी को प्रणाम कर दोनों वज्र के कमरे की ऒर चले गए। इकोनॉमिक्स के दो पाठ के प्रश्न, ग्राफिक्स वगैरा उन्होंने समझ कर पक्के कर लिए थे।
अब वैदेही डिमांड-सप्लाई का नियम समझा रही थी और वज्र बड़ी सी बुक में कुछ लिख रहा था। वैदेही का ध्यान जब वज्र पर गया तो उसने पूछा, "क्या लिख रहो हो... वज्र ने नोटबुक को जैसे ही छुपाने की कोशिश की वैदेही ने उसके हाथ से उसे खींच लिया और फिर देखती ही रह गई। वज्र ने उसका सुन्दर स्केच बनाया था। वह अपनी ही छवि को देख विस्मित थी। वह और कुछ कहती उसके पहले आजी ने दोनों को आवाज़ दी,'पोरानों! जेवायला या दोघ!'

वज्र और वैदेही दीवाणखाने में पहुँच चुके थे। दोनों खामोश थे। तभी फाटक के बाहर गाड़ी के रुकने की आवाज़ आई और जानकी जी गेट से अंदर पहुँच गई। आजी उन्हें देख बहुत खुश हुई। "बरं झालं गं पोरी! अगदी वेळेवर आलीस! जा! हाथ पाय धुऊन यें अन बस पाटा वर!" जानकी जी ने देखा, सभी उनका इंतज़ार कर रहे हैं, वह जल्दी-जल्दी तरोंताज़ा हो कर आ गई और सभी खाना खाने लगे।

लाली को अभी-अभी नींद आई थी कि बेल बजी। अप्पा ने दरवाजा खोला। लाली की माँ आ चुकी थी। ड्राइवर उसका सामान रख कर नीचे चला गया और अप्पा ने दरवाजा बन्द कर दिया। लाली की माँ ने हाथ-पैर धोये, फ्रेश हुई, सब के लिए लाई खाने की चीजें निकाली और बेटी के पास आ कर बैठ गई। उसके सिर पर हाथ रख वह उसे थपथपाने लगी। माँ का स्पर्श लाली ने पहचान लिया था। वह अवचेतन अवस्था में ही उसका हाथ पकड़कर गहरी नींद में खो गई...

स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।
अगला भाग अगले अंक में..

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