ये प्यार ही तो ज़िन्दगी... भाग 56
ये प्यार ही तो ज़िन्दगी... भाग 56
भाग ५६

यश के अवचेतन मन में विचारों की असंख्य लहरें हिलोरें ले रही थी। मदमस्त, शोख लहरों का शोर बार-बार यश को असहज कर रहा था। फलक पर चन्द्रमा के चेहरे पर थकान साफ़ झलक रही थी। वह रात के आँचल तले सोने को बेताब था और रात थी कि अपना पल्लू नादान बच्चें के हाथ से छुड़ा कर चुपके से घर से निकलना चाहती थी नई मंजिल को ढूंढने के लिए!

यश ने चुनौती स्वीकार तो कर ली थी लेकिन उसे हकीकत में बदलना इतना आसान नहीं था। अब परिवेश और हालत दोनों ही बदल चुके थे और यश नए परिवर्तन में खुद को ढालने की कोशिश में लगा हुआ था। बंसी काका की मदद के बिना भी अब वह अपने कृत्रिम पैर को लगा सकता था। तमाम पीड़ादायक स्थितियों तथा कठिनाइयों  के बावजूद यश हालात से समझौता कर आगे बढ़ना सीख गया था। 

सात बजे उसे नाश्ते के लिए नितीन सर के साथ निकलना था। समय के मामले में सर कितने कड़क और कठोर हैं यह यश अच्छी तरह जानता था! 'जो समय की कद्र नहीं करता उसकी समय भी कद्र नहीं करता' यह मन्त्र उसके जीवन का अभिन्न अंग बन चूका था। 

सर और यश दोनों ही सही समय पर डायनिंग हॉल में पहुँच चुके थे। उन्होंने थोड़ा हल्का-फूल्का नाश्ता किया, गर्म कॉफ़ी का आस्वाद लिया और दोनों निकल पड़े बैडमिंटन कोर्ट की तरफ! 

यश की रैकेट कुछ पुरानी जरूर थी लेकीन उसे इसी रैकेट से खेलना जमता था। इसीकी उसे आदत थी। दोनों ने अपनी रैकेट, शटल निकाले, स्पोर्ट्स शूज की लेस व्यवस्थित की और उतर गए कोर्ट में, शुरुआती 'वार्म अप एक्सरसाइज' करने! 

कोर्ट को उंगलियों से छूँ कर वंदन करते ही एक अलग ही ऊर्जा का संचार हो जाता था यश के तन-मन में! खेल उसका जुनून था! खेल उसकी ज़िन्दगी का अभिन्न हिस्सा था! राष्ट्रीय स्तर के इस कोर्ट पर खेलने का अनुभव भी कुछ अलग था! अच्छी सुविधा, बेहतर खेल सामग्री, शुद्ध वातावरण और अनुभवी प्रशिक्षक का खेल पर सकारात्मक प्रभाव तो होगा ही न!  
नितीन सर उससे अलग-अलग तरह की सर्विस की प्रैक्टिस करा रहे थे क्योंकि वह उसका हुकुम का इक्का था। सर्विस में विविधता लाकर वह प्रतिद्वंदी का मनोबल तोड़ने का काम सफलतापूर्वक कर सकता था। कभी वह ऊँची सर्विस देता तो कभी नेट के पास, कभी नेट के करीब से बहुत कम ऊँचाई पर तो कभी बहुत ऊँची सर्विस कोर्ट के दाएं-बाएं या पीछे के छोर पर!  

नितीन सर उसे खेल की बारीकियां समझा रहे थे तभी गौरव सर का आगमन हुआ।  नितीन सर ने गौरव सर का यश से परिचय कराया! तभी एक और खिलाडी आया। गौरव सर ने उसका सब से परिचय कराया! यश ने नितीन सर के साथ-साथ गौरव सर के भी पैर छुएं और एक तरफ खड़ा हो गया।  तभी एक और खिलाडी वहाँ आया जो हैदराबाद से आया हुआ था! बैडमिंटन के नामी-गिरामी कोच पुलेला गोपीचंद सर से उसने ट्रेनिंग ली हुई थी! उसका नाम था भास्कर रेड्डी! उसके साथ भी बहुत बुरा हादसा हुआ था और उसकी भी एक टांग काटनी पड़ी थी  जान बचाने के लिए!
खेल भी एक नशा ही तो हैं। जिसे खेल से प्यार हैं उसके कोर्ट पर कदम पड़ते ही इन्सान अपनी पीड़ा, दर्द, तकलीफ भूल जाता हैं। उसे याद रहता हैं सिर्फ और सिर्फ खेल! खेल ही हैं जो दिलों को जोड़ देता हैं, कठिनाइयों का हिम्मत से सामना कर उन्हें परास्त करने का हौसला देता हैं और खेल का जुनून ही होता हैं जो जीत का वरण कर उसे अपनी ऒर खींच लाता हैं जैसे वीर शिरोमणि पृथ्वीराज सिंह चव्हाण ने लाया था संयुक्ता को भरे स्वयंवर के मंडप से!

गौरव सर ने सभी से भास्कर को मिलाया और नितीन सर और गौरव सर चले गए अपने कमरे में कपडे बदलने! भास्कर और यश एक-दूसरे के साथ खेलने लगे! कुछ शॉट्स, रैलीज के बाद अब दोनों गेम खेलने लगे! पहली सर्विस पर यश ने पहला अंक ले लिया था! दोनों की अच्छी खासी रैलीज होने लगी थी ! दोनों कोच के लौटने तक तो यश और भास्कर एक-दूसरे के खेल को समझने लगे थे! दोनों का ध्यान सिर्फ खेल पर ही था। अकादमी का यह कोर्ट सभी आधुनिक सुविधाओं से लेस था। सभी तरफ कैमरे लगे हुए थे। कोच अपनी केबीन में बैठ कर भी खिलाडियों की गतिविधियों पर नज़र रख सकते थे, खिलाड़ियों की खेल की कमियों और विशेषताओं का विश्लेषण कर सकते थे और खिलाडी भी अपनी रिकॉर्डिंग को देख कर अपनी कमियों को सुधारने का प्रयास कर सकते थे। खेल में जीत के लिए प्रतिद्वंदी के खेल का अभ्यास भी जरुरी होता हैं क्योंकि खेल की तकनीक में प्रतिद्वंदी के कमजोर बिंदु को पहचान कर उसपर बार-बार वार करना भी सफलता का मार्ग प्रशस्त करता हैं।

दूसरे गेम के ख़त्म होने तक दोनों कोच आ चुके थे! कमरे में बैठ कर दोनों ने कुछ समय तक उनका मैच लाइव देखा था ! अब उन्हें कुछ-कुछ अंदाज आ गया था उनके खेल का! उन्होंने अब दोनों को प्रतिद्वंदी के रूप में डबल्स खेलने के लिए आमंत्रित किया! 

उनकी असली परीक्षा शुरू हो चुकी थी। कुछ समय तक नेट प्रक्टिस के बाद सभी गेम खेलने लगे! टॉस जीत कर पहली सर्विस भास्कर ने की। पहली ही सर्विस में गौरव सर ने ऐसा शॉट लगाया दोनों के बीच में कि दोनों संभल भी नहीं पाएं। यश की सर्विस पर नितीन सर ने नेट पर शटल को डाला और दोनों एक-दूसरे को तांकते रह गएं। यहाँ उनके तालमेल की कमी साफ़ नज़र आने लगी। 

यश समझ चूका था बहुत कुछ सीखना, समझना और सुधार करना जरुरी हैं। पहले ही दिन पसीना बहा कर दोनों थक चुके थे। गौरव सर ने दोनों को अपने पास बुलाया! नितीन सर भी पास में खड़े थे! उन्होंने दोनों को प्यार से समझाया। उन्हें साफ़-साफ़ कह दिया कि अगर तुम जी-जान लगा कर खेलना चाहते हो, पसीना बहाने को तैयार हो और तुम में लगन, जीवट, जज़्बा और ज़िद हैं तो ही इस अकादमी से जुडो वरना पहली ही गाड़ी से घर लौट जाओ! यश और भास्कर दोनों ने गौरव सर को विश्वास दिलाया और आश्वस्त किया कि वह मेहनत करने के लिए तैयार हैं।

अब शाम को छ: बजे उन्हें फिर बैडमिंटन कोर्ट पहुंचना था। उनका भोजन वगैरा सब कुछ सर और डाइटिशीयन के सूचना और सुझाव के अनुसार ही होनेवाला था। सभी गतिविधियों का समय निश्चित था।

बड़ा होना, कुछ उपलब्धि हासिल करना, देश का नाम विश्व में रोशन करने का मतलब आग का दरया पार करना था! उसके लिए अर्जुन की एकाग्रता, भागीरथ का प्रयास और ध्रुव सा तप जरुरी था।

यश ने इस चुनौती को पेलने का दृढ़ निश्चय कर दिया था। उसके लिए वह बड़ी से बड़ी कुर्बानी देने के लिए तैयार था! यह तो वक़्त ही बता सकता था कि वह अपने मकसद में कितना कामयाब हो पायेगा! 

स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।
अगला भाग अगले अंक में...


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