महावीर!
महावीर!

आंजनेय छन्द :

सिद्धारथ पुत राज दुलारे।
जननी त्रिशला शिशु है प्यारे।।
रिद्धि-सिद्धि अब वृद्धि पधारे।
लीला अनुपम जनता द्वारे।।१।।

मात-कोख रख स्थिरता भारी।
सुकल्पना धन-वैभव वारी।।
प्रजा राज्य में सुरभित सारी।
मधुवन की कुसुमित क्यारी।।२।।

वर्धमान जग उद्धारक है।
पाप-ताप बहु आलोचक है।।
देव भक्तजन के हितकारी।
खल अरिहंता धीरज धारी।।३।।

आज्ञाकारी वर्तन सुखकर।
आलोचक की पीड़ा-दुख हर।।
तात-मात की सेवा कर कर।
ताप वेदना पीड़ा हर कर।।४।।

संयम अभिलाषी अनुरागी।
त्याग भावना अतिशय जागी।।
दान-पुण्य कर ममता त्यागी।
मोह आत्म मन लगनी लागी।।५।।

दीक्षा धारक जिनवर प्यारे।
परिषह सह आत्मा को तारे।।
सत्य-अहिंसा ध्वज लहराएं ।
जियो और सब  जीवन पाएं।।६।।

राग त्याग तू कर सुमिरन।
छूट रहा पल सोया चेतन।।
परस्परों हित जीवन न्यारा।
सहयोगी बन मानुष प्यारा।।७।।

स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।
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