मन का मृग
मन का मृग
यूं सुकूं हर पहर में ढूंढते रहते हैं हम ।
खुद को ही घर में ढूंढते रहते हैं हम ।

एक दुश्मन भी होता तो अच्छा होता,
दोस्त क्यों शहर में ढूंढते रहते हैं हम ।

शाख जिसकी हमने खुद काटी थी,
फूल उस शजर में ढूंढते रहते हैं हम ।

साथ अपने जो कभी चला ही नहीं,
उसको ही सफर में ढूंढते रहते हैं हम ।

- शुभम आनंद मनमीत
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