कल के साये में आज
कल के साये में आज

कल और कल में ही उलझे रहे हम,
जो कल आया ही नहीं…
और जो कल बीत गया,
उसे हम भूल गए कहीं।
डर है बस इतना —
कि इन कल की उलझनों में,
कहीं ये आज…
हमें ही ना भुला दे।
कल के इंतज़ार में,
और बीते कल के भार में,
आज हाथ से फिसल न जाए —
बस यही सोचते रहे हम।


    द्वारा Diya Jaisinghani
    Shared21 Feb 2026
    Start20 Feb 2026
    End20 Feb 2031
    इस पर लोग क्या कह रहे हैं