2165521655modify कल के साये में आजकल और कल में ही उलझे रहे हम,जो कल आया ही नहीं…और जो कल बीत गया,उसे हम भूल गए कहीं।डर है बस इतना —कि इन कल की उलझनों में,कहीं ये आज…हमें ही ना भुला दे।कल के इंतज़ार में,और बीते कल के भार में,आज हाथ से फिसल न जाए —बस यही सोचते रहे हम।LabelDirected by द्वारा Diya JaisinghaniShared21 Feb 2026Start20 Feb 2026End20 Feb 2031 The Critic’s Cornerइस पर लोग क्या कह रहे हैंटिप्पणी लिखेंकल के साये में आज© टिप्पणी400 characters remainingजमा करेंरद्द करें