23242922429modify मानवता!मानवता मन में खिले, महके चहके बाग।प्रेम गंग बहती रहे, मधु हो सुर लय राग।।मधु हो सुर लय राग, सुरमई जीवन सारा।रवि किरणों का ओज, दया करुणा उजियारा।।आह्लादित हो भोर, नेह सेवा आकुलता।शुभ मंगल हो भाव, फले फूले मानवता।।चंचल जैनमुंबई, महाराष्ट्रLabelDirected by द्वारा चंचल जैनShared08 Dec 2025Start07 Dec 2025End07 Dec 2030 The Critic’s Cornerइस पर लोग क्या कह रहे हैंटिप्पणी लिखेंकुसुम सुराणा09-Dec-2025CommentLikeअप्रतिम!Manish Jain05-Jan-2026CommentLikeलाजवाब ❤️🙏❤️🙏❤️Hemant Jain12-Jan-2026CommentLikeबोहोत अछा पोस्ट है |मानवता!© टिप्पणी400 characters remainingजमा करेंरद्द करें