मानवता!
मानवता!


मानवता मन में खिले, महके चहके बाग।
प्रेम गंग बहती रहे, मधु हो सुर लय राग।।
मधु हो सुर लय राग, सुरमई जीवन सारा।
रवि किरणों का ओज, दया करुणा उजियारा।।
आह्लादित हो भोर, नेह सेवा आकुलता।
शुभ मंगल हो भाव, फले फूले मानवता।।

चंचल जैन
मुंबई, महाराष्ट्र

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